श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 14: आदर्श पारिवारिक जीवन  »  श्लोक 7

 
श्लोक
दिव्यं भौमं चान्तरीक्षं वित्तमच्युतनिर्मितम् ।
तत्सर्वमुपयुञ्जान एतत्कुर्यात्स्वतो बुध: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
दिव्यम्—आकाश से वर्षा होने के कारण सरलता से प्राप्य; भौमम्—खानों तथा समुद्र से प्राप्त; च—तथा; आन्तरीक्षम्—भाग्य से प्राप्त; वित्तम्—सारी सम्पत्ति; अच्युत-निर्मितम्—भगवान् द्वारा बनायी गयी; तत्—वस्तुएँ; सर्वम्—सारी; उपयुञ्जान— (मानव समाज या सारे जीवों के लिए) उपयोग में लाते हुए; एतत्—यह (शरीर पालन); कुर्यात्—करे; स्वत:—अतिरिक्त श्रम किये बिना, स्वत: प्राप्त; बुध:—बुद्धिमान व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् द्वारा उत्पन्न प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग जीवों के शरीरों तथा आत्माओं का पालन करने के लिए किया जाना चाहिए। जीवन की आवश्यकताएँ तीन प्रकार की हैं—वे जो आकाश से (वर्षा से) उत्पन्न हैं, वे जो पृथ्वी से (खानों, समुद्रों या खेतों से) उत्पन्न हैं तथा वे जो वायुमण्डल से (जो अचानक तथा अनपेक्षित रूप से) उत्पन्न होती हैं।
 
तात्पर्य
 विविध प्रकार के जीव भगवान् के बच्चों के समान हैं जैसाकि भगवद्गीता (१४.४) में भगवान् द्वारा पुष्टि की गई है—
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता ॥

“हे कुन्तीपुत्र! यह समझ लो कि सारी जीवयोनियाँ इस प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव बनाई जाती है और मैं उनका वीर्यदाता पिता हूँ।” भगवान् कृष्ण समस्त योनियों तथा रूप वाले जीवों के पिता हैं। जो बुद्धिमान है, वह यह देख सकता है कि चौरासी लाख योनियों में सारे जीव भगवान् के अंश हैं और उनके पुत्र हैं। भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों के भीतर प्रत्येक वस्तु भगवान् की सम्पत्ति है (ईशावास्यमिदं सर्वम् ) अतएव हर वस्तु उनसे सम्बन्धित है। इस सम्बन्ध में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं—

प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धिवस्तुन:।

मुमुक्षुभि: परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते ॥

“जो व्यक्ति किसी वस्तु को कृष्ण से उसके सम्बन्ध को जाने बिना त्यागता है उसका वैराग्य अपूर्ण कहा जाता है।” (भक्तिरसामृत सिन्धु १.२.२५६) यद्यपि मायावादी विचारक यह कहते हैं कि यह सृष्टि मिथ्या है, किन्तु वास्तव में यह ऐसी है नहीं। यह तथ्य है, किन्तु यह विचार मिथ्या है कि प्रत्येक वस्तु मानव समाज की है। प्रत्येक वस्तु भगवान् की है, क्योंकि वह उनके द्वारा उत्पन्न की गई है। सारे जीव भगवान् के पुत्र, उनके शाश्वत अंश रूप में होने के कारण अपने पिता की सम्पत्ति का उपयोग प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार करने के अधिकारी हैं। जैसाकि उपनिषदों में कहा गया है—

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथ मा गृध: कस्य स्विद्धनम्। प्रत्येक व्यक्ति को भगवान् द्वारा उसके लिए निर्धारित की गई वस्तुओं से संतुष्ट रहना चाहिए। किसी दूसरे के अधिकारों में या सम्पत्ति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता (३.१४) में कहा गया है—

अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भव:।

यज्ञाद् भवन्ति पर्जन्य: यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ॥

“सारे जीव अन्न पर निर्भर हैं और यह अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ करने से होती है और यज्ञ नियत कर्तव्यों से उत्पन्न होता है।” जब काफी अन्न उत्पन्न होता है, तो पशु तथा मनुष्य दोनों का ही उदर-पोषण बिना किसी कठिनाई के हो जाता है। यह प्राकृतिक व्यवस्था है। प्रकृते: क्रियामाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:। प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के अधीन कर्म कर रहा है। केवल मूर्ख ही यह सोचते हैं कि वे ईश्वर द्वारा उत्पन्न की गई वस्तुओं में सुधार ला सकते हैं। गृहस्थों का यह विशेष दायित्व है कि वे यह देखें कि मनुष्यों, जातियों, समाजों या राष्ट्रों के मध्य किसी प्रकार के संघर्ष के बिना भगवान् के नियमों का पालन हो। मानव समाज को ईश्वर के उपहारों का, विशेष रूप से उस अन्न का, सदुपयोग करना चाहिए जो आकाश से होने वाली वर्षा के कारण उत्पन्न होता है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—यज्ञाद् भवति पर्जन्य:। यह वर्षा नियमित रूप से हो इसके लिए मनुष्यों को यज्ञ करने चाहिए। पूर्व काल में घी तथा अन्न की आहुति डाल कर यज्ञ सम्पन्न किये जाते थे, किन्तु इस युग में ऐसा कर पाना असम्भव है, क्योंकि मानव समाज के पापकर्मों के कारण घी तथा अन्न का उत्पादन घट गया है। किन्तु लोगों को चाहिए कि कृष्णभावनामृत को ग्रहण करे और हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करे जैसाकि शास्त्रों द्वारा अनुमोदित है (यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस:)। यदि विश्व भर के लोग कृष्णभावनामृत आन्दोलन को ग्रहण कर लें और भगवान् के दिव्य नाम तथा कीर्ति का कीर्तन करें तो वर्षा का अभाव न रहे; फलस्वरूप अन्न, फल तथा फूल ठीक से उत्पन्न हों और जीवन की सारी आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। गृहस्थों को ऐसे प्राकृतिक उत्पादन की व्यवस्था का भार उठाना चाहिए। इसीलिए कहा गया है—तस्येव हेतो: प्रयतेत कोविद:। बुद्धिमान मनुष्य को भगवन्नाम के कीर्तन द्वारा कृष्णभावनामृत का प्रसार करना चाहिए और तब जीवन की सारी आवश्यकताएँ स्वत: प्राप्त हो जाएँगी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥