श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  » 

 
 
संक्षेप विवरण:  पन्द्रहवें अध्याय का सारांश इस प्रकार है। पिछले अध्याय में श्रीनारद मुनि ने समाज में ब्राह्मण की महत्ता सिद्ध की। इस अध्याय में अब वे ब्राह्मण की विभिन्न कोटियों...
 
श्लोक 1:  नारद मुनि ने कहा : हे राजन्, कुछ ब्राह्मण सकाम कर्मों में अत्यधिक आसक्त रहते हैं, कुछ तपस्या में और कुछ वैदिक साहित्य का अध्ययन करने में तो कुछ (भले ही कम क्यों न हों) ज्ञान का अनुशीलन करते हैं और विभिन्न योगों का, विशेष रूप से भक्ति योग का अभ्यास करते हैं।
 
श्लोक 2:  जो व्यक्ति अपने पितरों या स्वयं की मुक्ति का इच्छुक हो उसे चाहिए कि ऐसे ब्राह्मण को दान दे जो निर्विशेष-अद्वैतवाद में निष्ठा (ज्ञान निष्ठा) रखता हो। ऐसे उच्च ब्राह्मण के अभाव में, सकाम कर्मों (कर्मकाण्ड) में अनुरक्त ब्राह्मण को दान दिया जाय।
 
श्लोक 3:  मनुष्य को चाहिए कि देवताओं को आहुति देते समय केवल दो ब्राह्मणों को और पितरों को आहुति देते समय तीन ब्राह्मणों को आमंत्रित करे। अथवा इन दोनों में केवल एक-एक ब्राह्मण काफी होगा। कोई कितना ही ऐश्वर्यवान क्यों न हो, उसे अधिक ब्राह्मण नहीं आमंत्रित करने चाहिए या इन अवसरों पर अत्यन्त खर्चीली व्यवस्था नहीं करनी चाहिए।
 
श्लोक 4:  यदि कोई श्राद्ध कर्म के समय अनेक ब्राह्मणों या सम्बन्धियों को भोजन कराने की व्यवस्था करता है, तो काल, देश, श्राद्ध, पदार्थ, पात्र और पूजन विधि में त्रुटियाँ होंगी।
 
श्लोक 5:  जब उपयुक्त शुभ अवसर तथा स्थान प्राप्त हो तो मनुष्य को चाहिए कि अत्यन्त प्रेमपूर्वक भगवान् के अर्चाविग्रह को घी में बना भोजन अर्पित करे और फिर उपयुक्त व्यक्ति अर्थात् वैष्णव या ब्राह्मण को प्रसाद दे। इससे अक्षय समृद्धि आएगी।
 
श्लोक 6:  मनुष्य को चाहिए कि देवताओं, साधु पुरुषों, अपने पितरों, लोगों, अपने पारिवारिक सदस्यों, अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों को भगवान् के भक्तों के रूप में देखते हुए प्रसाद प्रदान करे।
 
श्लोक 7:  धार्मिक सिद्धान्तों से भली-भाँति अवगत मनुष्य को चाहिए कि वह श्राद्ध कर्म में मांस, अंडे या मछली जैसी कोई वस्तु अर्पित न करे और न ही स्वयं भी ऐसी वस्तु खाए, चाहे वह क्षत्रिय ही क्यों न हो। जब घी से बना उपयुक्त भोजन सन्त जनों को दिया जाता है, तो यह कृत्य पितरों तथा भगवान् को अत्यन्त प्रिय लगता है, क्योंकि वे यज्ञ के नाम पर पशुओं का वध किये जाने पर कभी प्रसन्न नहीं होते।
 
श्लोक 8:  जो लोग श्रेष्ठ धर्म में प्रगति करना चाहते हैं उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अन्य जीवों से शरीर, वाणी या मन सम्बन्धी सारी ईर्ष्या छोड़ दें। इससे बढक़र कोई अन्य धर्म नहीं है।
 
श्लोक 9:  आध्यात्मिक ज्ञान से जागृत होने से यज्ञ के विषय में बुद्धिमान व्यक्ति, धार्मिक नियमों के वास्तविक ज्ञाता तथा निष्काम व्यक्ति अपने को आध्यात्मिक ज्ञान की अथवा परम सत्य विषयक ज्ञान की अग्नि में संयमित बनाते हैं। वे कर्मकाण्डीय अनुष्ठान विधि को त्याग सकते हैं।
 
श्लोक 10:  यज्ञ सम्पन्न करने वाले व्यक्ति को देखकर बलि दिये जाने वाले सारे पशु यह सोचकर अत्यन्त डरे रहते हैं कि “यह निर्दय यज्ञकर्ता यज्ञ के उद्देश्य से अनजान होने तथा अन्यों का वध करके परम सन्तुष्ट होने के कारण हमें निश्चित रूप से मार डालेगा।”
 
श्लोक 11:  अतएव जो वास्तव में धर्म के सिद्धान्तों से अभिज्ञ है और बेचारे पशुओं से अत्यधिक ईर्ष्या नहीं करता उसे दिन-प्रति-दिन प्रसन्नतापूर्वक नैत्यिक तथा किन्हीं विशेष अवसरों पर किये जाने वाले यज्ञों को भगवत्कृपा से जो भी भोजन सरलता से उपलब्ध हो जाये उसी से सम्पन्न करना चाहिए।
 
श्लोक 12:  अधर्म की पाँच शाखाएँ हैं, जो विधर्म, परधर्म, आभास, उपधर्म तथा छल धर्म के नाम से उचित रूप में विख्यात हैं। जो असली धार्मिक जीवन से अवगत हो उसे इन पाँचों को अधर्म मानकर इनका परित्याग कर देना चाहिए।
 
श्लोक 13:  जो धार्मिक नियम किसी को अपना धर्म पालन करने से रोकते हैं विधर्म कहलाते हैं। अन्यों द्वारा चालू किये गये धार्मिक नियम पर-धर्म कहलाते हैं। जो मिथ्या गर्व करता है और वेदों के नियमों का विरोध करता है उसके द्वारा सृजित नये प्रकार का धर्म उपधर्म कहलाता है। शब्द जाल द्वारा विवेचना छल धर्म है।
 
श्लोक 14:  ऐसी कोई भी बनावटी धार्मिक प्रणाली, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा बनाई गई हो जो जानबूझ कर अपने आश्रम के नियत कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, आभास कहलाती है। किन्तु यदि कोई अपने किसी आश्रम विशेष या वर्ण के अनुसार अपने नियत कर्तव्य करता है, तो फिर वे सारे भौतिक कष्टों को भगाने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं हैं?
 
श्लोक 15:  निर्धन होकर भी मनुष्य को अपने शरीर-निर्वाह के लिए या विख्यात धर्मज्ञ बनने के लिए अपनी आर्थिक दशा सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार एक अजगर एक ही स्थान पर पड़ा रहकर तथा अपनी जीविका के लिए कोई प्रयास (चेष्टा) न करते हुए भी शरीर निर्वाह के लिए भोजन प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार निष्काम व्यक्ति बिना किसी चेष्टा के अपनी जीविका कमा लेता है।
 
श्लोक 16:  जो आत्मतुष्ट है और अपने कर्मों को प्रत्येक हृदय में निवास करने वाले भगवान् से जोड़ता है, वह अपनी जीविका के लिए चेष्टा किये बिना दिव्य सुख भोगता है। भला उस भौतिकतावादी के लिए ऐसा सुख कहाँ जो विषय तथा लोभ से प्रेरित रहता है और जो धन जोडऩे की इच्छा से सभी दिशाओं में भागता रहता है?
 
श्लोक 17:  जिसके पाँवों में उचित जूते हों उसे कंकड़-पत्थरों तथा काँटों पर चलने में कोई भय नहीं लगता। उसके लिए सभी कुछ कल्याणमय (शुभ) है। इसी प्रकार जो सदैव आत्मतुष्ट रहता है उसे दुख नहीं सताते; वह सर्वत्र सुख का अनुभव करता है।
 
श्लोक 18:  हे राजन्, आत्मतुष्ट व्यक्ति केवल जल पीकर भी सुखी रह सकता है। किन्तु जो व्यक्ति इन्द्रियों द्वारा चालित है, विशेष रूप से जो जीभ और जननेन्द्रियों के वश में होता है उसे अपनी इन्द्रियों की तुष्टि के लिए घरेलू कुत्ते का पद स्वीकार करना पड़ता है।
 
श्लोक 19:  भक्त या ब्राह्मण जो आत्म-तुष्ट नहीं होता, उसका आध्यात्मिक ज्ञान, विद्या, तपस्या तथा कीर्ति उसकी इन्द्रियलोलुपता के कारण क्षीण हो जाते हैं और उसका ज्ञान शनै: शनै: लुप्त हो जाता है।
 
श्लोक 20:  भूख तथा प्यास से पीडि़त मनुष्य की प्रबल शारीरिक इच्छाएँ तथा आवश्यकताएँ भोजन करने के बाद निश्चित रूप से तुष्ट हो जाती हैं। इसी प्रकार यदि कोई क्रोध करता है, तो प्रताडऩा तथा उसके फल द्वारा क्रोध तुष्ट हो जाता है। लेकिन जहाँ तक लालच की बात है, यदि लालची व्यक्ति संसार की सारी दिशाओं को जीत ले या संसार की प्रत्येक वस्तु का भोग कर ले तो भी वह तुष्ट नहीं होगा।
 
श्लोक 21:  हे राजा युधिष्ठिर, अनेक अनुभवी व्यक्ति, अनेक विधि सलाहकार, अनेक विद्वान तथा विद्वत्सभाओं के सभापति बनने योग्य अनेक व्यक्ति अपने-अपने पदों से सन्तुष्ट न होने के कारण नारकीय जीवन में जा गिरते हैं।
 
श्लोक 22:  दृढ़ता-पूर्वक योजनाएँ बनाकर मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति की कामपूर्ण इच्छाएँ त्याग देनी चाहिए। इस प्रकार ईर्ष्या त्यागकर क्रोध पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, धन संग्रह करने के दोषों पर विचार-विमर्श करके लोभ का परित्याग करना चाहिए और सत्य की विवेचना करके भय का त्याग करना चाहिए।
 
श्लोक 23:  आध्यात्मिक ज्ञान के विवेचन से शोक तथा मोह पर विजय प्राप्त की जा सकती है, महान् भक्त की सेवा करके अहंकाररहित बना जा सकता है, मौन रह कर योग मार्ग के अवरोधों से बचा जा सकता है और इन्द्रियतृप्ति को रोक देने से ही ईर्ष्या पर विजय पाई जा सकती है।
 
श्लोक 24:  मनुष्य को चाहिए कि अन्य जीवों के कारण होने वाले दुखों का प्रतिकार अच्छे आचरण (सदाचार) तथा ईर्ष्या से रहित होकर करे, भाग्य द्वारा प्रदत्त कष्टों का सामना समाधि में ध्यान करके करे और शरीर तथा मन से उत्पन्न दुखों का प्रतिकार हठ योग, प्राणायाम आदि के अभ्यास द्वारा करे। इसी प्रकार विशेष रूप से सतोगुण का विकास करके खाने के मामले में, निद्रा पर विजय पाई जाये।
 
श्लोक 25:  मनुष्य को सतोगुण विकसित करके रजोगुण तथा तमोगुण को जीतना चाहिए और तब शुद्ध सत्त्व के पद तक उठ कर सतोगुण से विरक्त हो लेना चाहिए। यदि कोई श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक गुरु की सेवा में लगा रहे तो यह सब कुछ स्वत: हो सकता है। इस प्रकार प्रकृति के गुणों के प्रभाव पर विजय पाई जा सकती है।
 
श्लोक 26:  गुरु को साक्षात् भगवान् मानना चाहिए, क्योंकि वह प्रकाश के लिए दिव्य ज्ञान प्रदान करता है। फलस्वरूप जो यह भौतिक धारणा रखता है कि गुरु सामान्य मनुष्य होता है उसके लिए हर वस्तु निराशाजनक रहती है। उसका प्रकाश, उसका वैदिक अध्ययन तथा ज्ञान झील में हाथी के स्नान के समान होता है।
 
श्लोक 27:  भगवान् कृष्ण अन्य समस्त जीवों के तथा भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं। व्यास जैसे महर्षि उनके चरणकमलों की तलाश करते और उन्हें पूजते हैं। तो भी कुछ ऐसे मूर्ख हैं, जो कृष्ण को सामान्य मनुष्य मानते हैं।
 
श्लोक 28:  अनुष्ठान (कर्मकाण्ड), विधि-विधान, तपस्या तथा योगाभ्यास—ये सभी इन्द्रियों तथा मन को वश में करने के लिए हैं, किन्तु इन्द्रियों तथा मन को वश में कर लेने के बाद भी यदि वह भगवान् का ध्यान नहीं करता तो ये सारे कार्यकलाप श्रम के अपव्यय मात्र हैं।
 
श्लोक 29:  जिस तरह वृत्तिपरक कार्यकलाप या व्यापार के लाभ किसी की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक नहीं बन सकते, अपितु वे भौतिक बन्धन के कारण बन जाते हैं उसी तरह वैदिक कर्मकाण्ड ऐसे किसी व्यक्ति की सहायता नहीं कर सकते जो भगवान् का भक्त नहीं है।
 
श्लोक 30:  जो मन पर विजय पाने का इच्छुक हो उसे अपने परिवार का साथ छोड़ते हुए दूषित संगित से मुक्त एकान्त स्थान में रहना चाहिए। अपने शरीर-पोषण के लिए उसे उतना ही माँगना चाहिए जितने से जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी हो जायँ।
 
श्लोक 31:  हे राजा, योग सम्पन्न करने के लिए पवित्र तथा पुण्य तीर्थस्थल में किसी एक स्थान को चुने। यह स्थान समतल हो—न तो अधिक ऊँचा और न नीचा। तब वहाँ सुखपूर्वक स्थिर तथा समभाव से बैठकर शरीर को सीधा रखकर वैदिक प्रणव का उच्चारण प्रारम्भ करे।
 
श्लोक 32-33:  विद्वान योगी अपनी नाक के अग्रभाग पर निरन्तर दृष्टि लगाकर पूरक, कुम्भक तथा रेचक नामक श्वास लेने के आसन का—अर्थात् वह श्वास भीतर ले जाने, बाहर निकालने और फिर दोनों को रोक देने का—अभ्यास करता है। इस प्रकार योगी अपने मन को भौतिक आसक्तियों से रोकता है और सारी मानसिक इच्छाएँ त्याग देता है। ज्योंही मन कामेच्छाओं के वशीभूत होकर इन्द्रियतृप्ति की भावनाओं की ओर हटे त्योंही योगी को उसे तुरन्त वापस लाकर हृदय के भीतर बाँध लेना चाहिए।
 
श्लोक 34:  जब योगी इस तरह नियमित रूप से अभ्यास करता है, तो अल्प काल में उसका हृदय स्थिर हो जाता है और विचलित नहीं होता जिस प्रकार लपट या धूम से रहित अग्नि स्थिर हो जाती है।
 
श्लोक 35:  जब मनुष्य की चेतना भौतिक कामेच्छाओं से अदूषित होती है, तो वह सभी कार्यों में शान्त हो जाती है, क्योंकि मनुष्य नित्य आनन्दमय जीवन को प्राप्त होता है। एक बार इस पद पर स्थित हो जाने पर मनुष्य फिर भौतिक कार्यकलापों की ओर वापस नहीं जाता।
 
श्लोक 36:  जो संन्यास आश्रम स्वीकार करता है, वह धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन भौतिकतावादी कार्यकलापों के सिद्धान्तों को छोड़ देता है, जिनमें मनुष्य गृहस्थ जीवन में लिप्त रहता है। जो व्यक्ति पहले संन्यास स्वीकार करता है, किन्तु बाद में ऐसी भौतिकतावादी क्रियाओं में लौट आता है, वह वान्ताशी अर्थात् अपनी ही वमन को खाने वाला कहलाता है। निस्सन्देह, वह निर्लज्ज व्यक्ति है।
 
श्लोक 37:  जो संन्यासी पहले यह समझते हैं कि शरीर मर्त्य है और यह विष्ठा, कृमि या राख में परिणत हो जाएगा किन्तु जो पुन: शरीर को महत्त्व प्रदान करते हैं तथा आत्मा कहकर उसका गुणगान करते हैं उन्हें सबसे बड़ा धूर्त मानना चाहिए।
 
श्लोक 38-39:  गृहस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति के लिए विधि-विधानों का परित्याग करना, गुरु के संरक्षण में रहते हुए ब्रह्मचारी के लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन न करना, वानप्रस्थ के लिए गाँव में रहना और तथाकथित सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहना अथवा संन्यासी के लिए इन्द्रियतृप्ति में अनुरक्त रहना निन्दनीय हैं। जो ऐसा करता है, वह अत्यन्त निम्न श्रेणी का माना जाता है। ऐसा दिखावटी व्यक्ति भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहग्रस्त रहता है। मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसे व्यक्ति को किसी भी पद से निकाल दे या हो सके तो उस पर दया करके उसे शिक्षा दे जिससे वह अपने मूल पद पर वापस चला जाए।
 
श्लोक 40:  मनुष्य का शरीर आत्मा तथा परमात्मा को जानने के निमित्त होता है और ये दोनों आध्यात्मिक पद पर स्थित हैं। यदि उच्च ज्ञान से परिष्कृत हुए व्यक्ति द्वारा इन दोनों को जाना जा सकता है, तो फिर मूर्ख तथा लालची व्यक्ति किसके लिए और किस कारण से इस शरीर का पालन इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है?
 
श्लोक 41:  ज्ञान में बढ़े-चढ़े अध्यात्मवादी भगवान् के आदेश से बने शरीर की तुलना रथ से करते हैं; इन्द्रियाँ घोड़ों के तुल्य हैं; इन्द्रियों का स्वामी मन लगाम सदृश है, इन्द्रियविषय गन्तव्य हैं, बुद्धि सारथी है और सारे शरीर में व्याप्त चेतना इस भौतिक जगत के बन्धन का कारण है।
 
श्लोक 42:  शरीर के भीतर कार्यशील दस प्रकार की वायुओं की तुलना रथ के पहिए के अरों (तीलियों) से की गई है और इस पहिए के ऊपरी तथा निचले भाग धर्म तथा अधर्म कहलाते हैं। देहात्मबुद्धि में रहने वाला जीव रथ का स्वामी है। वैदिक प्रणव मंत्र ही धनुष है, साक्षात् शुद्ध जीव तीर है और परम पुरुष उसका लक्ष्य है।
 
श्लोक 43-44:  बद्ध-अवस्था में मनुष्य की जीवन सम्बन्धी धारणाएँ कभी कभी कामेच्छा तथा अज्ञान (रजो तथा तमो गुण) के कारण दूषित हो जाती हैं, जो आसक्ति, शत्रुता, लोभ, शोक, मोह, भय, मद, झूठी प्रतिष्ठा, अपमान, छिद्रान्वेषण, छलावा, ईर्ष्या, असहिष्णुता, कामेच्छा, मोह, भूख तथा निद्रा के रूप में प्रकट होती हैं। ये सभी शत्रु हैं। कभी-कभी सतोगुण के द्वारा भी मनुष्य की धारणाएँ दूषित हो जाती हैं।
 
श्लोक 45:  जब तक मनुष्य को इस शरीर को इसके विभिन्न अंगों तथा साज-सामान सहित जो पूर्णतया अपने वश में नहीं हैं स्वीकार करना है, तब तक उसे अपने श्रेष्ठ जनों—अपने गुरु तथा गुरु के पूर्ववर्तियों व्यक्तियों के चरणकमलों को धारण करना चाहिए। उनकी कृपा से वह ज्ञान की तलवार को तेज कर सकता है और भगवत् कृपा के बल पर तब वह उपर्युक्त शत्रुओं को पराजित कर सकता है। इस प्रकार भक्त को अपने ही दिव्य आनन्द में लीन रहने में समर्थ होना चाहिए और तब वह अपना शरीर त्याग कर अपनी आध्यात्मिक पहचान फिर से पा सकता है।
 
श्लोक 46:  अन्यथा यदि मनुष्य अच्युत कृष्ण तथा बलदेव की शरण ग्रहण नहीं कर लेता तो इन्द्रियाँ रूपी घोड़े तथा बुद्धि रूपी सारथी दोनों ही भौतिक कल्मष के प्रति उन्मुख होने से अनजाने ही शरीर रूपी रथ को इन्द्रियतृप्ति के मार्ग पर ला खड़ा करते हैं। इस प्रकार जब विषय के धूर्तों— खाना, सोना तथा मैथुन—के द्वारा वह आकृष्ट होता है, तो घोड़े तथा सारथी संसार के अन्धकूप में गिरा दिए जाते हैं और मनुष्य पुन: जन्म-मृत्यु की घातक तथा अत्यन्त भयावह स्थिति में आ पड़ता है।
 
श्लोक 47:  वेदों के अनुसार प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दो प्रकार के कार्यकलाप होते हैं—प्रवृत्ति कार्यों का अर्थ है अपने को भौतिकतावादी जीवन की निम्नतर अवस्था से उच्चतर अवस्था तक उठाना जबकि निवृत्ति का अर्थ है भौतिक इच्छा का अन्त। प्रवृत्ति कार्यों से मनुष्य भौतिक बन्धन में कष्ट उठाता है, किन्तु निवृत्ति कार्यों से वह शुद्ध हो जाता है और नित्य आनन्दमय जीवन को भोगने के योग्य बनता है।
 
श्लोक 48-49:  अग्निहोत्र-यज्ञ, दर्श-यज्ञ, पूर्णमास-यज्ञ, चातुर्मास्य-यज्ञ, पशु-यज्ञ तथा सोम-यज्ञ नामक सारे अनुष्ठानों तथा यज्ञों की विशेषता पशुओं का वध करना तथा अनेक अमूल्य पदार्थों को, विशेष रूप से अन्नों को, जलाना है। ये सब भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए सम्पन्न किये जाते हैं तथा ये चिन्ता (अशान्ति) उत्पन्न करते हैं। ऐसे यज्ञ करना, वैश्वदेव का पूजन तथा बलिहरण उत्सव सम्पन्न करना जो सभी सम्भवत: जीवन लक्ष्य माने जाते हैं तथा देवताओं के लिए मन्दिर बनवाना, विश्रमागृह तथा बगीचे बनवाना, जल वितरण के लिए कुएँ खुदवाना, भोजन वितरण के लिए केन्द्रों की स्थापना करना तथा जन-कल्याण के कार्य करना—ये सब लक्षण भौतिक इच्छाओं के प्रति आसक्ति से अभिव्यक्त होते है।
 
श्लोक 50-51:  हे राजा युधिष्ठिर, जब यज्ञ में घी, अन्न (यथा जौ एवं तिल) की आहुतियाँ दी जाती हैं, तो वे दिव्य धुएँ में परिणत हो जाती हैं, जो मनुष्य को क्रमश: उच्च से उच्चतर लोकों को या धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणम् तथा अन्त में चन्द्र लोक को ले जाता हैं। किन्तु यज्ञकर्ता फिर पृथ्वी पर उतर कर औषधियाँ, लताएँ, वनस्पतियाँ तथा अन्न बन जाते हैं। तब वे विभिन्न जीवों द्वारा खाये जाते हैं और वीर्य में परिणत होते हैं जिसे मादा शरीर में प्रविष्ट किया जाता है। इस प्रकार मनुष्य पुन:-पुन: जन्म लेता है।
 
श्लोक 52:  द्विज (द्वि-जन्मा ब्राह्मण) को गर्भाधान संस्कार के द्वारा अपने माता-पिता की अनुकम्पा से अपना जीवत्व प्राप्त होता है। जीवन के अन्त में अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की जाती है। और तब तक अन्य संस्कार भी संपन्न किए जाते हैं। इस तरह योग्य ब्राह्मण को कुछ समय के बाद भौतिकतावादी कार्यों तथा यज्ञों में अरुचि हो जाती है, किन्तु वह ऐन्द्रिय यज्ञों को पूर्ण ज्ञान के साथ कर्मेन्द्रियों को अर्पित कर देता है, जो ज्ञान की अग्नि से प्रकाशित रहती हैं।
 
श्लोक 53:  मन स्वीकृति तथा अस्वीकृति की तरंगों से सदैव विक्षुब्ध होता रहता है। अतएव इन्द्रियों के सारे कार्यकलाप मन को अर्पित कर देना चाहिए और मन को अपने शब्दों में अर्पित कर देना चाहिए; फिर इन शब्दों को समस्त वर्णों के समूह में अर्पित करना चाहिए जिसे ओङ्कार के संक्षिप्त रूप को अर्पित कर दिया जाना चाहिए। ओङ्कार को बिन्दु में, बिन्दु को नाद में और उस नाद को प्राणवायु में समर्पित करना चाहिए। जो शेष रूप में जीव बचे उसे परम ब्रह्म में स्थापित करे। यही यज्ञ की विधि है।
 
श्लोक 54:  ऊपर जाते हुए जीव अग्नि, सूर्य, दिन, सायं, शुक्ल पक्ष, पूर्ण चन्द्रमा तथा सूर्य के उत्तर दिशा जाने की अवधि (उत्तरम्) एवं इनके अधिष्ठाता देवताओं के विभिन्न लोकों में प्रवेश करता है। जब वह ब्रह्मलोक में प्रविष्ट होता है, तो वहाँ लाखों वर्षों तक जीवन भोग करने के बाद अन्त में उसकी भौतिक उपाधि समाप्त हो जाती है। तब वह सूक्ष्म उपाधि प्राप्त करता है, जिससे उसे कारण रूप उपाधि प्राप्त होती है, जो समस्त पूर्ववर्ती अवस्थाओं की साक्षी होती है। इस अवस्था के विनष्ट होने पर उसे शुद्ध अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें वह परमात्मा के साथ अपनी पहचान करता है। इस प्रकार से जीव दिव्य बन जाता है।
 
श्लोक 55:  आत्म-साक्षात्कार तक उठने की यह क्रमिक विधि उन लोगों के लिए है, जो सचमुच परम सत्य से अवगत हैं। इस देवयान नामक मार्ग पर बारम्बार जन्म लेने से ये क्रमिक अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं। जो आत्मा में स्थित है और समस्त भौतिक इच्छाओं से पूर्णतया मुक्त है उसे इस बारम्बार जन्म-मृत्यु के मार्ग से गुजरने की आवश्यकता नहीं होती।
 
श्लोक 56:  इस भौतिक शरीर में स्थित रहते हुए भी जो पितृयान तथा देवयान मार्गों से पूर्णतया अवगत रहता है और जिसकी आँखें वैदिक ज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार खुली रहती हैं वह भौतिक जगत में कभी मोहग्रस्त नहीं होता।
 
श्लोक 57:  जो भीतर बाहर, सभी वस्तुओं तथा जीवों के प्रारम्भ तथा अन्त में, भोग्य तथा भोक्ता के रूप में, उच्च तथा नीच के रूप में विद्यमान है, वह परम सत्य है। वह सदैव ज्ञान तथा ज्ञेय, अभिव्यक्ति तथा अभिज्ञेय, अंधकार तथा प्रकाश के रूप में रहता है। इस तरह वे परमेश्वर सर्वस्व हैं।
 
श्लोक 58:  दर्पण से प्राप्त सूर्य के प्रतिबिम्ब को मिथ्या माना जा सकता है, किन्तु इसका वास्तविक अस्तित्व तो होता ही है। उसी तरह कल्पना (ज्ञान) द्वारा यह सिद्ध करना कि तत्त्व का कोई अस्तित्व नहीं होता अत्यन्त कठिन होगा।
 
श्लोक 59:  इस जगत में पाँच तत्त्व हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश। किन्तु शरीर न तो उनका प्रतिबिम्ब है, न उनका संयोग या उनका रूपान्तर। चूँकि शरीर तथा इसके अवयव न तो पृथक्-पृथक् हैं, न मिश्रित अतएव ऐसे सारे सिद्धान्त निराधार हैं।
 
श्लोक 60:  चूँकि शरीर पाँच तत्त्वों से बना है अतएव यह सूक्ष्म इन्द्रियविषयों के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। चूँकि शरीर मिथ्या है, अतएव इन्द्रियविषय भी स्वभावत: मिथ्या या क्षणिक हैं।
 
श्लोक 61:  जब किसी वस्तु को उसके अंशों से पृथक् कर दिया जाता है, तो उनमें समानता (सादृश्य) मानना भ्रम (मोह) कहलाता है। स्वप्न देखते समय मनुष्य जागने तथा सोने की स्थितिओं में अन्तर उत्पन्न कर देता है। ऐसी मानसिक अवस्था में शास्त्रों के विधानों की, जो आदेशों तथा निषेधों के रूप में होते हैं, संस्तुति की जाती है।
 
श्लोक 62:  भाव, क्रिया तथा द्रव्य की अद्वैतता (एकत्व) पर विचार करने के बाद तथा आत्मा को समस्त कार्य-कारणों से पृथक् मानते हुए मुनि अपनी ही अनुभूति से जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं को त्याग देता है।
 
श्लोक 63:  जब मनुष्य यह समझता है कि फल तथा कारण एक हैं और द्वैत अन्तत: इस विचार की भाँति अवास्तविक है कि वस्त्र के धागे वस्त्र से भिन्न हैं, तो वह एकत्व के मान को प्राप्त होता है, जिसे भावाद्वैत कहते हैं।
 
श्लोक 64:  हे युधिष्ठिर (पार्थ), जब मनुष्य के मन, वाणी तथा शरीर द्वारा किये गये सारे कार्य साक्षात् भगवान् की सेवा में समर्पित किये जाते हैं, तो उसे क्रियाद्वैत नामक कर्मों का एकत्व प्राप्त होता है।
 
श्लोक 65:  जब किसी मनुष्य का चरम लक्ष्य अपना तथा अपनी पत्नी का, अपनी सन्तानों का, अपने सम्बन्धियों का तथा अन्य समस्त देहधारियों का स्वार्थ एक ही हो तो यह द्रव्याद्वैत कहलाता है।
 
श्लोक 66:  हे राजा युधिष्ठिर, संकट न रहने पर सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन-स्तर के अनुसार नियत कार्यकलापों को ऐसी वस्तुओं, प्रयासों तथा विधियों से सम्पन्न करे तथा ऐसे स्थानों पर निवास करे जो उसके लिए निषिद्ध न हों । वह अन्य विधियों का उपयोग न करे।
 
श्लोक 67:  हे राजा, मनुष्य को अपने वृत्तिपरक कर्तव्य इन निर्देशों तथा वैदिक ग्रन्थों में दिए गये अन्य निर्देशों के अनुसार सम्पन्न करने चाहिए जिससे वह भगवान् कृष्ण का भक्त बना रहे। इस प्रकार घर पर रहकर भी मनुष्य अपने गन्तव्य तक पहुँच सकता है।
 
श्लोक 68:  हे राजा युधिष्ठिर, तुम सभी पाण्डवों ने परमेश्वर की सेवा के कारण अनेक राजाओं तथा देवताओं द्वारा उत्पन्न बड़े से बड़े संकटों पर विजय प्राप्त कर ली। तुमने कृष्ण के चरणकमलों की सेवा करके हाथियों के समान बड़े-बड़े शत्रुओं को जीत लिया है और अपने यज्ञ के लिए सामग्री एकत्र की है। भगवत्कृपा से तुम भव-बन्धन से छूट जाओगे।
 
श्लोक 69:  बहुत समय पूर्व, एक अन्य महाकल्प (ब्रह्मा का युग) में मैं उपबर्हण नामक गन्धर्व के रूप में था। अन्य गन्धर्वों में मेरा अत्यधिक सम्मान था।
 
श्लोक 70:  मेरा मुखमण्डल सुन्दर था और मेरी शारीरिक रचना आकर्षक तथा सुहावनी थी। फूल के हारों से तथा चन्दन लेप से अलंकृत होने से मैं अपने नगर की स्त्रियों को अत्यन्त मोहक लगता था। इस तरह मैं मोहग्रस्त था और विषय-वासनाओं से सदैव पूर्ण रहता था।
 
श्लोक 71:  एक बार देवताओं की सभा में भगवान् की महिमा के गायन के लिए एक संकीर्तन किया गया जिसमें गन्धर्वों तथा अप्सराओं को भाग लेने के लिए प्रजापतियों ने आमंत्रित किया।
 
श्लोक 72:  नारद मुनि ने आगे कहा : उत्सव में बुलाये जाने पर मैं भी वहां गया। स्त्रियों से घिर कर मैंने देवताओं की महिमा का संगीतात्मक गायन प्रारम्भ किया। इसके कारण प्रजापितयों ने मुझे इन शब्दों में बलात् शाप दे डाला “चूँकि तुमने अपराध किया है अतएव तुम तुरन्त सौन्दर्य से विहीन शूद्र बन जाओ।”
 
श्लोक 73:  यद्यपि मैंने एक दासी के गर्भ से शूद्र के रूप में जन्म लिया किन्तु मैं वैदिक ज्ञान में पारंगत वैष्णवों की सेवा में लग गया। फलस्वरूप इस जीवन में मुझे ब्रह्माजी के पुत्र रूप में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
 
श्लोक 74:  भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन इतना शक्तिशाली है कि इससे गृहस्थ भी उसी चरम फल को सरलता से प्राप्त कर लेते हैं, जो संन्यासियों को प्राप्त होता है। हे महाराज युधिष्ठिर, मैंने तुम्हें धर्म की वह विधि बतला दी है।
 
श्लोक 75:  हे महाराज युधिष्ठिर, तुम सभी पाण्डव इस संसार में इतने भाग्यशाली हो कि ब्रह्माण्ड के समस्त लोकों को पवित्र करने वाले अनेकानेक सन्तजन तुम्हारे घर में सामान्य दर्शक के रूप में आते हैं। साथ ही, भगवान् कृष्ण तुम्हारे घर में गोपनीय ढंग से तुम्हारे भाई के समान रह रहे हैं।
 
श्लोक 76:  यह कितना आश्चर्यजनक है कि वे परब्रह्म कृष्ण जिन्हें बड़े-बड़े मुनि अपनी मुक्ति तथा शाश्वत आनन्द प्राप्ति के लिए ढूँढते रहते हैं तुम्हारे श्रेष्ठ शुभचिन्तक, मित्र, ममेरे भाई, आत्मा, पूज्य निर्देशक तथा गुरु की भाँति कार्य कर रहे हैं।
 
श्लोक 77:  यहाँ अब वही भगवान् उपस्थित हैं जिनका असली रूप ब्रह्मा तथा शिव जी जैसे महापुरुषों की भी समझ में नहीं आता। उनके भक्त अपने निष्ठापूर्ण आत्मसमर्पण द्वारा उनका साक्षात्कार करते हैं। ऐसे भगवान् जो अपने भक्तों के पालनकर्ता हैं और जिनकी पूजा मौन, भक्ति तथा उपशम द्वारा की जाती है हम पर प्रसन्न हों।
 
श्लोक 78:  श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : श्रेष्ठ भरतवंशी युधिष्ठिर ने नारद मुनि के वर्णन से सब कुछ जान लिया। इन उपदेशों को सुनने के बाद उन्हें अपने हृदय में अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ और उन्होंने अत्यन्त प्रेमविह्वल होकर भगवान् कृष्ण की पूजा की।
 
श्लोक 79:  कृष्ण तथा महाराज युधिष्ठिर द्वारा पूजे जाकर नारद मुनि उनसे विदा लेकर चले गये। युधिष्ठिर महाराज अपने ममेरे भाई कृष्ण को भगवान् के रूप में सुनकर अत्यधिक चकित हुए।
 
श्लोक 80:  इस ब्रह्माण्ड के भीतर समस्त लोकों में सारे जड़ तथा चेतन प्राणी जिनमें देवता, असुर तथा मनुष्य सम्मिलित हैं महाराज दक्ष की पुत्रियों से उत्पन्न हुए। इस तरह मैंने उन सबों का तथा उनके विभिन्न वंशों का वर्णन कर दिया है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥