श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 10

 
श्लोक
द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं द‍ृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति ।
एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृप्ध्रुवम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
द्रव्य-यज्ञै:—पशुओं तथा अन्य खाद्य वस्तुओं से; यक्ष्यमाणम्—ऐसे यज्ञों में व्यस्त व्यक्ति; दृष्ट्वा—देख कर; भूतानि—जीवों (पशु) को; बिभ्यति—डर जाता है; एष:—यह व्यक्ति (यज्ञकर्ता); मा—मुझको; अकरुण:—निर्दयी; हन्यात्—मार डालेगा; अ-तत्-ज्ञ:—अत्यन्त अज्ञानी; हि—निस्सन्देह; असु-तृप्—अन्यों को मार कर सन्तुष्ट रहने वाला; ध्रुवम्—निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 यज्ञ सम्पन्न करने वाले व्यक्ति को देखकर बलि दिये जाने वाले सारे पशु यह सोचकर अत्यन्त डरे रहते हैं कि “यह निर्दय यज्ञकर्ता यज्ञ के उद्देश्य से अनजान होने तथा अन्यों का वध करके परम सन्तुष्ट होने के कारण हमें निश्चित रूप से मार डालेगा।”
 
तात्पर्य
 धर्म के नाम पर प्राय: सारे विश्व में प्रत्येक स्थापित धर्म में पशु-यज्ञ प्रचलित है। कहा जाता है कि जब जीसस क्राइस्ट केवल बारह वर्ष के थे तो यहूदियों को पूजागृह में पशु-पक्षियों की बलि चढ़ाते देखकर उन्हें आघात पहुंचा था। अतएव उन्होंने यहूदी धर्म त्यागकर ईसाई धर्म चलाया जिसमें पुराने टेस्टामेंट के आदेश “तू वध नहीं करेगा” का
दृढ़ता से पालन किया जाता था। किन्तु इस समय यज्ञ के नाम पर न केवल पशुओं का वध किया जाता है, अपितु कसाईघरों की संख्या बढ़ जाने से पशु-वध में प्रचुर वृद्धि हुई है। धर्म या भोजन के लिए पशुओं का वध अत्यन्त घृणित है और यहाँ पर उसकी भर्त्सना की जाती है। जब तक कोई निर्दय न हो, वह धर्म के नाम पर और भोजन के लिए पशुओं की बलि नहीं चढ़ा सकता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥