श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 11

 
श्लोक
तस्माद्दैवोपपन्नेन मुन्यन्नेनापि धर्मवित् ।
सन्तुष्टोऽहरह: कुर्यान्नित्यनैमित्तिकी: क्रिया: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अतएव; दैव-उपपन्नेन—भगवत्कृपा से सरलता से प्राप्य; मुनि-अन्नेन—(घी से तैयार तथा भगवान् को अर्पित) भोजन से; अपि—निस्सन्देह; धर्म-वित्—धर्म में बढ़ा-चढ़ा; सन्तुष्ट:—अत्यन्त सुखपूर्वक; अह: अह:—दिन प्रति दिन; कुर्यात्—करे; नित्य-नैमित्तिकी:—नियमित तथा कभी-कभी; क्रिया:—कर्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव जो वास्तव में धर्म के सिद्धान्तों से अभिज्ञ है और बेचारे पशुओं से अत्यधिक ईर्ष्या नहीं करता उसे दिन-प्रति-दिन प्रसन्नतापूर्वक नैत्यिक तथा किन्हीं विशेष अवसरों पर किये जाने वाले यज्ञों को भगवत्कृपा से जो भी भोजन सरलता से उपलब्ध हो जाये उसी से सम्पन्न करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 धर्मवित् शब्द महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है “जो धर्म के वास्तविक प्रयोजन को जानता है।” जैसाकि भगवद्गीता (१८.६६) में बताया गया है—सर्व-धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—धर्म को समझने में कृष्णभावनाभावित होना सर्वोच्च अवस्था है। जो इस अवस्था तक पहुँच जाता है, वह भक्ति की अर्चना विधि को सम्पन्न करता है। चाहे कोई गृहस्थ हो या संन्यासी, वह अपने पास उचित रूप से पैक किया हुआ भगवान् का छोटा अर्चाविग्रह रख सकता है या सम्भव हो तो स्थापित कर सकता है और इस तरह राधा-कृष्ण, सीताराम, लक्ष्मी नारायण, भगवान् जगन्नाथ या श्री चैतन्य महाप्रभु के अर्चाविग्रहों की पूजा घी से बना भोजन अर्पित
करके कर सकता है। फिर वह इस पवित्र किए गए प्रसाद को पितरों, देवताओं या अन्य जीवों को नैत्यिक कर्म की भाँति प्रदान कर सकता है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सारे केन्द्रों में अर्चाविग्रह पूजन का कार्य अत्यन्त सुन्दर ढंग से चलता आ रहता है जहाँ अर्चाविग्रह को अर्पित करने के बाद भोजन को उच्चकोटि के ब्राह्मणों तथा वैष्णवों में, यहाँ तक कि सामान्य लोगों तक में, वितरित कर दिया जाता है। इस तरह से सम्पन्न किये गये यज्ञ से पूर्ण संतुष्टि मिलती है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सारे सदस्य नित्य ऐसे दिव्य कार्य करते हैं। अतएव हमारे इस आन्दोलन में पशुओं के वध का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥