श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 12

 
श्लोक
विधर्म: परधर्मश्च आभास उपमा छल: ।
अधर्मशाखा: पञ्चेमा धर्मज्ञोऽधर्मवत्त्यजेत् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
विधर्म:—अधर्म; पर-धर्म:—अन्यों द्वारा अभ्यास किये जाने वाला धर्म; च—तथा; आभास:—दिखावटी धर्म; उपमा— सिद्धान्त जो धार्मिक लगते हैं किन्तु होते नहीं; छल:—ठगने वाला धर्म; अधर्म-शाखा:—जो अधर्म की विभिन्न शाखाएँ हैं; पञ्च—पाँच; इमा:—ये; धर्म-ज्ञ:—धर्म को जानने वाला; अधर्म-वत्—उन्हें अधार्मिक के रूप में स्वीकार करते हुए; त्यजेत्— त्याग दे ।.
 
अनुवाद
 
 अधर्म की पाँच शाखाएँ हैं, जो विधर्म, परधर्म, आभास, उपधर्म तथा छल धर्म के नाम से उचित रूप में विख्यात हैं। जो असली धार्मिक जीवन से अवगत हो उसे इन पाँचों को अधर्म मानकर इनका परित्याग कर देना चाहिए।
 
तात्पर्य
 कोई भी धर्म जो भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने का विरोधी हो उसे विधर्म या छल धर्म माना जाना चाहिए और जो वास्तव में धर्म में रुचि रखता हो उसे इनका परित्याग कर देना चाहिए। उसे एकमात्र कृष्ण के आदेशों का पालन करना चाहिए और उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिए। ऐसा करने के लिए निस्सन्देह,
उत्तम बुद्धि की आवश्यकता होती है, जो अनेक जन्मों के बाद भक्तों की सत्संगति करने तथा कृष्णभावनामृत का अभ्यास करने के बाद ही जागृत हो सकती है। श्रीकृष्ण द्वारा संस्तुत धर्म—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—के अतिरिक्त प्रत्येक धर्म को अधर्म समझ कर त्याग देना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥