श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 13

 
श्लोक
धर्मबाधो विधर्म: स्यात्परधर्मोऽन्यचोदित: ।
उपधर्मस्तु पाखण्डो दम्भो वा शब्दभिच्छल: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म-बाध:—अपने धर्म को लागू होने से रोकता है; विधर्म:—धर्म के विरुद्ध; स्यात्—हो; पर-धर्म:—ऐसे धर्म का अनुकरण जिसके लिए वह अनुपयुक्त हो; अन्य-चोदित:—किसी अन्य के द्वारा चालू किया गया; उपधर्म:—मनगढंत धर्म; तु—निस्सन्देह; पाखण्ड:—जो वेदों के नियमों, प्रामाणिक शास्त्रों के विरुद्ध है; दम्भ:—जो मिथ्या ही गर्वित है; वा—अथवा; शब्द-भित्— शब्द जाल से; छल:—ठगने वाला धर्म ।.
 
अनुवाद
 
 जो धार्मिक नियम किसी को अपना धर्म पालन करने से रोकते हैं विधर्म कहलाते हैं। अन्यों द्वारा चालू किये गये धार्मिक नियम पर-धर्म कहलाते हैं। जो मिथ्या गर्व करता है और वेदों के नियमों का विरोध करता है उसके द्वारा सृजित नये प्रकार का धर्म उपधर्म कहलाता है। शब्द जाल द्वारा विवेचना छल धर्म है।
 
तात्पर्य
 नये प्रकार के धर्म को जन्म देना इस युग का फैशन बन चुका है। तथाकथित स्वामी और योगी इसका समर्थन करते हैं कि मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार किसी भी प्रकार के धर्म का पालन कर सकता है क्योंकि सारी प्रणालियाँ अन्ततोगत्वा एक हैं। किन्तु श्रीमद्भागवत में ऐसे फैशनपरस्त विचारों को विधर्म कहा गया है क्योंकि ये अपनी ही धार्मिक प्रणाली के विरुद्ध होते हैं। भगवान् ने असली धार्मिक प्रणाली का वर्णन किया है—सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। असली धार्मिक प्रणाली भगवान् के चरणकमलों में शरण ग्रहण करना है। श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध में अजामिल के उद्धार के प्रसंग में यमराज कहते हैं—धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्—असली धर्म वह है, जो भगवान् द्वारा
प्रदत्त है, जिस प्रकार असली विधिशास्त्र वह है, जो सरकार द्वारा प्रदत्त है। कोई अपने घर में न तो असली विधि (कानून) बना सकता है न ही वास्तविक धर्म बना सकता है। अन्यत्र कहा गया है—स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे—असली धार्मिक प्रणाली वह है, जो मनुष्य को भगवान् का भक्त बना देती है। अतएव प्रगतिशील कृष्णभावनामृत की इस धार्मिक प्रणाली से जो कुछ भी विपरीत है, वह विधर्म, परधर्म, उपधर्म या छल धर्म कहलाता है। भगवद्गीता की गलत व्याख्या छल-धर्म है। जब कृष्ण कुछ कहते हैं, किन्तु मूढ़ विवेचक उसका कुछ भिन्न अर्थ लगाते हैं, तो यह छल धर्म, ठगने का धर्म या शब्दभित् या शब्द जाल है। मनुष्य को धर्म की इन छलने वाली विविध प्रणालियों से बचना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥