श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 15

 
श्लोक
धर्मार्थमपि नेहेत यात्रार्थं वाधनो धनम् ।
अनीहानीहमानस्य महाहेरिव वृत्तिदा ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म-अर्थम्—धर्म तथा आर्थिक विकास में; अपि—निस्सन्देह; न—नहीं; ईहेत—प्राप्त करने का प्रयत्न करे; यात्रा-अर्थम्— एकसाथ शरीर और आत्मा के जीवननिर्वाह के लिए; वा—अथवा; अधन:—निर्धन; धनम्—धन; अनीहा—अनिच्छा; अनीहमानस्य—ऐसे व्यक्ति का, जो अपनी जीविका कमाने के लिए प्रयास नहीं करता; महा-अहे:—अजगर; इव—सदृश; वृत्ति-दा—जो प्रयास किये बिना जीविका प्राप्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 निर्धन होकर भी मनुष्य को अपने शरीर-निर्वाह के लिए या विख्यात धर्मज्ञ बनने के लिए अपनी आर्थिक दशा सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार एक अजगर एक ही स्थान पर पड़ा रहकर तथा अपनी जीविका के लिए कोई प्रयास (चेष्टा) न करते हुए भी शरीर निर्वाह के लिए भोजन प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार निष्काम व्यक्ति बिना किसी चेष्टा के अपनी जीविका कमा लेता है।
 
तात्पर्य
 मनुष्य शरीर कृष्णभावनामृत विकसित करने मात्र के लिए मिला है। मनुष्य को अपने शरीर निर्वाह के लिए किसी प्रकार की जीविका अर्जित करने का प्रयास करने की भी आवश्यकता नहीं है। इसे अजगर का उदाहरण देकर समझाया गया है। अजगर एक ही स्थान पर लेटा रहता है और अपने उदर-पोषण के लिए जीविकोपार्जन हेतु इधर-उधर नहीं जाता है फिर भी भगवान् की कृपा से उसका पालन होता है। जैसाकि नारद मुनि ने उपदेश दिया है (भागवत १.५.१८)—तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविद:—मनुष्य को केवल कृष्णभावनामृत को बढ़ाने की चेष्टा करनी चाहिए। उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं करनी चाहिए, यहाँ तक कि जीविकोपार्जन की भी नहीं करना चाहिए। इस मनोवृत्ति के अनेक उदाहरण प्राप्त हैं। उदाहरणार्थ
माधवेन्द्र पुरी कभी किसी से भोजन माँगने नहीं जाते थे। शुकदेव गोस्वामी ने भी कहा है—कस्माद् भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान्। ऐसे व्यक्ति के पास क्यों जाया जाये जो धन से अन्धा हो गया हो? प्रत्युत मनुष्य को कृष्ण पर आश्रित रहना चाहिए, वे ही सब कुछ प्रदान करेंगे। हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सारे सदस्यों को, चाहे वे गृहस्थ हों या संन्यासी, दृढ़ता के साथ कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रसार करना चाहिए। कृष्ण सारी आवश्यकताएँ पूरी करेंगे। इस प्रसंग में अजगर वृत्ति को अत्यधिक सराहा गया है। कोई अत्यंत निर्धन क्यों न हो, उसे कृष्णभावनामृत मात्र में अग्रसर होने का प्रयास करना चाहिए और अपनी जीविका कमाने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥