श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 18

 
श्लोक
सन्तुष्ट: केन वा राजन्न वर्तेतापि वारिणा ।
औपस्थ्यजैह्व्यकार्पण्याद्गृहपालायते जन: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
सन्तुष्ट:—सदैव आत्मतुष्ट रहने वाला व्यक्ति; केन—क्यों; वा—अथवा; राजन्—हे राजा; न—नहीं; वर्तेत—(सुखपूर्वक) रहना चाहिए; अपि—भी; वारिणा—जल पीकर; औपस्थ्य—विषयेन्द्रियों के कारण; जैह्व्य—तथा जीभ के कारण; कार्पण्यात्— बुरी दशा होने से; गृह-पालायते—घरेलू कुत्ते की तरह बन जाता है; जन:—ऐसा व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, आत्मतुष्ट व्यक्ति केवल जल पीकर भी सुखी रह सकता है। किन्तु जो व्यक्ति इन्द्रियों द्वारा चालित है, विशेष रूप से जो जीभ और जननेन्द्रियों के वश में होता है उसे अपनी इन्द्रियों की तुष्टि के लिए घरेलू कुत्ते का पद स्वीकार करना पड़ता है।
 
तात्पर्य
 शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण या कृष्णभावनामृत में सुसंस्कृत व्यक्ति अपने जीवन-निर्वाह के लिए, विशेष रूप से इन्द्रियों की तुष्टि के लिए, किसी की नौकरी नहीं करेगा। असली ब्राह्मण सदा तुष्ट रहता है। यदि उसके पास खाने को कुछ भी नहीं रहता तो वह थोड़ा जल पीकर सन्तुष्ट हो सकता है। यह अभ्यास की बात है। किन्तु दुर्भाग्यवश किसी को यह शिक्षा नहीं दी जाती कि आत्म-साक्षात्कार
में किस तरह तुष्ट रहा जाये। जैसाकि ऊपर बाताया जा चुका है भक्त इसीलिए सदा संतुष्ट रहता है, क्योंकि उसे अपने हृदय के भीतर परमात्मा की उपस्थिति का आभास होता रहता है और वह उन्हीं के विषय में चौबीसों घंटे चिन्तन करता है। यही असली तुष्टि है। भक्त कभी भी जीभ तथा जननेन्द्रियों के आदेशों पर नहीं चलता अतएव वह कभी भी प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डित नहीं होता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥