श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 19

 
श्लोक
असन्तुष्टस्य विप्रस्य तेजो विद्या तपो यश: ।
स्रवन्तीन्द्रियलौल्येन ज्ञानं चैवावकीर्यते ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
असन्तुष्टस्य—आत्मतुष्ट न होने वाले; विप्रस्य—ब्राह्मण का; तेज:—बल; विद्या—शिक्षा; तप:—तपस्या; यश:—कीर्ति; स्रवन्ति—चुक जाते हैं; इन्द्रिय—इन्द्रियों के; लौल्येन—लालच से; ज्ञानम्—ज्ञान; च—तथा; एव—निश्चय ही; अवकीर्यते— धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 भक्त या ब्राह्मण जो आत्म-तुष्ट नहीं होता, उसका आध्यात्मिक ज्ञान, विद्या, तपस्या तथा कीर्ति उसकी इन्द्रियलोलुपता के कारण क्षीण हो जाते हैं और उसका ज्ञान शनै: शनै: लुप्त हो जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥