श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 20

 
श्लोक
कामस्यान्तं हि क्षुत्तृड्भ्यां क्रोधस्यैतत्फलोदयात् ।
जनो याति न लोभस्य जित्वा भुक्त्वा दिशो भुव: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
कामस्य—इन्द्रियतृप्ति या शरीर की किसी अविलम्ब आवश्यकता के लिए इच्छा का; अन्तम्—अन्त; हि—निस्सन्देह; क्षुत्- तृड्भ्याम्—भूखे या प्यासे के द्वारा; क्रोधस्य—क्रोध का; एतत्—यह; फल-उदयात्—प्रताडऩ का उदय होने तथा उसके फल से; जन:—मनुष्य; याति—पार कर लेता है; न—नहीं; लोभस्य—लालच का; जित्वा—जीतकर; भुक्त्वा—भोगकर; दिश:— सारी दिशाएँ; भुव:—भूमण्डल की ।.
 
अनुवाद
 
 भूख तथा प्यास से पीडि़त मनुष्य की प्रबल शारीरिक इच्छाएँ तथा आवश्यकताएँ भोजन करने के बाद निश्चित रूप से तुष्ट हो जाती हैं। इसी प्रकार यदि कोई क्रोध करता है, तो प्रताडऩा तथा उसके फल द्वारा क्रोध तुष्ट हो जाता है। लेकिन जहाँ तक लालच की बात है, यदि लालची व्यक्ति संसार की सारी दिशाओं को जीत ले या संसार की प्रत्येक वस्तु का भोग कर ले तो भी वह तुष्ट नहीं होगा।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (३.३७) में कहा गया है कि इस संसार में काम, क्रोध तथा लोभ बद्धजीव के बन्धन के कारण होते हैं। काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:। जब इन्द्रियतृप्ति के लिए प्रबल विषयवासना की पूर्ति नहीं होती तो मनुष्य क्रोध करता है। यह क्रोध तभी शमित होता है जब वह अपने शत्रु को ताडि़त कर लेता है, किन्तु जब लोभ बढ़ जाता है, तो भला मनुष्य कृष्णभावनामृत में किस तरह प्रगति कर सकता है क्योंकि लोभ रजोगुण से उत्पन्न सबसे बड़ा शत्रु है।
यदि कोई कृष्णभावनामृत को बढ़ाने के लिए अत्यधिक लोभ करता है, तो यह महान् वरदान है। तब लौल्यमेकलं मूलम्। यह सर्वश्रेष्ठ सुलभ मार्ग है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥