श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 21

 
श्लोक
पण्डिता बहवो राजन्बहुज्ञा: संशयच्छिद: ।
सदसस्पतयोऽप्येके असन्तोषात्पतन्त्यध: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
पण्डिता:—पण्डित; बहव:—अनेक; राजन्—हे राजा (युधिष्ठिर); बहु-ज्ञा:—अनुभवी व्यक्ति; संशय-च्छिद:—कानूनी सलाह देने में पटु; सदस: पतय:—विद्वत् सभाओं का सभापति चुने जाने योग्य व्यक्ति; अपि—भी; एके—एक अवगुण से; असन्तोषात्—केवल असन्तोष या लालसा के कारण; पतन्ति—नीचे गिरते हैं; अध:—जीवन के नरक में ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा युधिष्ठिर, अनेक अनुभवी व्यक्ति, अनेक विधि सलाहकार, अनेक विद्वान तथा विद्वत्सभाओं के सभापति बनने योग्य अनेक व्यक्ति अपने-अपने पदों से सन्तुष्ट न होने के कारण नारकीय जीवन में जा गिरते हैं।
 
तात्पर्य
 आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को भौतिक दृष्टि से संतुष्ट होना चाहिए क्योंकि ऐसा न होने पर भौतिक विकास के लालच से उसकी आध्यात्मिक प्रगति अस्त-व्यस्त हो जाएगी। ऐसी दो बातें हैं, जो सारे सद्गुणों को व्यर्थ कर देती हैं। एक है विपन्नता या दरिद्रता। दरिद्रदोषो गुणराशिनाशी। यदि कोई फटेहाल (दरिद्र) है, तो उसके सारे सद्गुण व्यर्थ हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि कोई अत्यधिक लालची (लोभी) हो जाता है, तो उसके सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं। अतएव ऐसा तालमेल होना चाहिए कि मनुष्य दरिद्र न हो, किन्तु वह जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं से तुष्ट होने का प्रयत्न करे तथा लालच न करे। अतएव आध्यात्मिक उन्नति के लिए भक्त के लिए सर्वश्रेष्ठ सलाह यही है कि वह न्यूनतम आवश्यकताओं से तुष्ट रहे। फलस्वरूप
भक्ति में पारंगत विद्वान सलाह देते हैं कि मन्दिरों तथा मठों की संख्या बढ़ाने की चेष्टा न की जाये। ऐसे कार्य केवल वे भक्त कर सकते हैं, जो कृष्णभावनामृत आन्दोलन को अग्रसर करने में अनुभवी हैं। दक्षिण भारत के सारे आचार्यों ने, विशेषतया श्रीरामानुजाचार्य ने, अनेक बड़े-बड़े मन्दिर बनवाये और उत्तर भारत में वृन्दावन के सभी गोस्वामियों ने बड़े-बड़े मन्दिर बनवाये। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ने भी गौड़ीय मठ नाम से बड़े बड़े केन्द्र निर्मित कराये। अतएव मन्दिर निर्माण कराना बुरा नहीं है बशर्ते कि कृष्णभावनामृत के प्रसार के लिए सतर्कता बरती जाये। भले ही ऐसे प्रयास लोभपूर्ण माने जाँय, किन्तु ये यह लोभ कृष्ण को तुष्ट करने के लिए है और सभी आध्यात्मिक कार्य हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥