श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 22

 
श्लोक
असङ्कल्पाज्जयेत्कामं क्रोधं कामविवर्जनात् ।
अर्थानर्थेक्षया लोभं भयं तत्त्वावमर्शनात् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
असङ्कल्पात्—संकल्प से; जयेत्—जीते; कामम्—कामेच्छाओं को; क्रोधम्—क्रोध को; काम-विवर्जनात्—इन्द्रिय इच्छा के विषय को त्याग देने से; अर्थ—धन संग्रह; अनर्थ—दुख का कारण; ईक्षया—मानने से; लोभम्—लोभ को; भयम्—भय को; तत्त्व—सत्य; अवमर्शनात्—विचार करने से ।.
 
अनुवाद
 
 दृढ़ता-पूर्वक योजनाएँ बनाकर मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति की कामपूर्ण इच्छाएँ त्याग देनी चाहिए। इस प्रकार ईर्ष्या त्यागकर क्रोध पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, धन संग्रह करने के दोषों पर विचार-विमर्श करके लोभ का परित्याग करना चाहिए और सत्य की विवेचना करके भय का त्याग करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने सुझाया है कि किस तरह इन्द्रियतृप्ति के लिए विषयवासनाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है। कोई भी मनुष्य स्त्रियों के विषय में सोचना नहीं छोड़ सकता क्योंकि इस तरह सोचना स्वाभाविक है; सडक़ पर चलते हुए भी उसे अनेक स्त्रियाँ दिखेंगी। किन्तु यदि कोई स्त्री के साथ न रहने का संकल्प कर ले तो वह स्त्री को देखकर भी कामुक नहीं होगा। यदि कोई मैथुन न करने का निश्चय कर ले तो वह विषयवासनाओं पर स्वत: विजय पा लेगा। इस प्रसंग में उदाहरण दिया जाता है कि यदि कोई भूखा भी हो किन्तु यदि वह
किसी दिन उपवास करने का संकल्प कर ले तो वह भूख-प्यास की बाधाओं को विजय प्राप्त कर सकेगा। यदि कोई संकल्प कर ले कि वह किसी से ईर्ष्या नहीं करेगा तो वह सहज ही क्रोध पर विजय पा लेगा। इसी प्रकार वह धन संचय करने की इच्छा को त्याग सकता है मात्र यदि वह इतना ही सोच ले कि अपने पास आये धन की रक्षा करना कितना कठिन है। यदि किसी के पास प्रचुर नकद धन रहता है, तो वह उसे ठीक से संभालने के विषय में चिन्तित रहता है। इस तरह यदि कोई धन संचय के अवगुणों की विवेचना करे तो वह स्वभावत: बिना कठिनाई के अपना व्यवसाय छोड़ सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥