श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 23

 
श्लोक
आन्वीक्षिक्या शोकमोहौ दम्भं महदुपासया ।
योगान्तरायान्मौनेन हिंसां कामाद्यनीहया ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
आन्वीक्षिक्या—भौतिक तथा आध्यात्मिक विषयों में विचार-विमर्श करके; शोक—शोक; मोहौ—तथा मोह; दम्भम्—मिथ्या अभिमान को; महत्—वैष्णव; उपासया—सेवा द्वारा; योग-अन्तरायान्—योग के मार्ग में अवरोधों पर; मौनेन—मौन से; हिंसाम्—ईर्ष्या; काम-आदि—इन्द्रिय तृप्ति के लिए; अनीहया—बिना चेष्टा के ।.
 
अनुवाद
 
 आध्यात्मिक ज्ञान के विवेचन से शोक तथा मोह पर विजय प्राप्त की जा सकती है, महान् भक्त की सेवा करके अहंकाररहित बना जा सकता है, मौन रह कर योग मार्ग के अवरोधों से बचा जा सकता है और इन्द्रियतृप्ति को रोक देने से ही ईर्ष्या पर विजय पाई जा सकती है।
 
तात्पर्य
 यदि किसी का पुत्र मर गया हो तो शोक तथा मोह से प्रभावित होना और मृत पुत्र के लिए रोना स्वाभाविक है। लेकिन भगवद्गीता के निम्नलिखित श्लोकों पर विचार करने से वह शोक तथा मोह पर विजय पा सकता है—
जातस्य हि धुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

चूँकि आत्मा का देहान्तर होता है अतएव जिसने जन्म लिया है उसे अवश्यमेव यह शरीर छोडऩा और फिर दूसरा शरीर ग्रहण करना होता है। इसके लिए शोक करना व्यर्थ है। अतएव कृष्ण कहते हैं—धीरस्तत्र न मुह्यति—जो धीर है, जो दर्शन का विद्वान है और ज्ञानी है, वह आत्मा के देहान्तरण पर कभी दुखी नहीं हुआ करता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥