श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 24

 
श्लोक
कृपया भूतजं दु:खं दैवं जह्यात्समाधिना ।
आत्मजं योगवीर्येण निद्रां सत्त्वनिषेवया ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
कृपया—अन्य जीवों पर दयालु होने से; भूत-जम्—अन्य जीवों के कारण; दु:खम्—दुख; दैवम्—भाग्य द्वारा प्रदत्त दुख; जह्यात्—त्याग दे; समाधिना—समाधि या ध्यान द्वारा; आत्म-जम्—शरीर तथा मन के कारण दुख; योग-वीर्येण—हठयोग, प्राणायाम इत्यादि के अभ्यास से; निद्राम्—नींद को; सत्त्व-निषेवया—सतोगुण या ब्राह्मण-गुणों का विकास करके ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि अन्य जीवों के कारण होने वाले दुखों का प्रतिकार अच्छे आचरण (सदाचार) तथा ईर्ष्या से रहित होकर करे, भाग्य द्वारा प्रदत्त कष्टों का सामना समाधि में ध्यान करके करे और शरीर तथा मन से उत्पन्न दुखों का प्रतिकार हठ योग, प्राणायाम आदि के अभ्यास द्वारा करे। इसी प्रकार विशेष रूप से सतोगुण का विकास करके खाने के मामले में, निद्रा पर विजय पाई जाये।
 
तात्पर्य
 मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसा भोजन करने का अभ्यास करे जिससे अन्य जीवों को कष्ट न पहुँचे। चूँकि किसी द्वारा चिकोटी काटे जाने या मारे जाने पर मुझे कष्ट होता है इसलिए मुझे भी अन्य जीवों को चिकोटी काटने या उन्हें मारने का प्रयास नहीं करना चाहिए। लोगों को यह पता नहीं रहता कि निर्दोष पशुओं का वध करने के कारण उन्हें प्रकृति के कठोर कर्मफलों को भोगना पड़ेगा। जिस भी देश के लोग अनावश्यक पशु-वध
करते हैं उन्हें प्रकृति द्वारा लादे जाने वाले युद्ध तथा महामारी के कष्ट को भोगना पड़ेगा। अतएव अन्यों के कष्ट से अपने कष्टों की तुलना करके मनुष्य को सभी जीवों पर दयालु रहना चाहिए। कोई भाग्य द्वारा थोपे गये कष्टों से बच नहीं सकता अतएव जब कष्ट आ जाये तो मनुष्य को चाहिए कि हरे कृष्ण मंत्र के जाप में पूर्णतया लीन हो जाये। मनुष्य हठ योग के अभ्यास से शरीर तथा मन के कष्टों से बच सकता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥