श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 27

 
श्लोक
एष वै भगवान्साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वर: ।
योगेश्वरैर्विमृग्याङ्‌घ्रिर्लोको यं मन्यते नरम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह; वै—निस्सन्देह; भगवान्—भगवान्; साक्षात्—प्रत्यक्ष; प्रधान—प्रकृति के मुख्य कारण; पुरुष—पुरुषावतार भगवान् विष्णु का या समस्त जीवों का; ईश्वर:—परम नियन्ता; योग-ईश्वरै:—बड़े-बड़े साधु पुरुषों या योगियों द्वारा; विमृग्य- अङ्घ्रि:—भगवान् कृष्ण के चरणकमल, जिनकी खोज की जाती है; लोक:—सामान्य जन; यम्—उसको; मन्यते—मानते हैं; नरम्—मनुष्य ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण अन्य समस्त जीवों के तथा भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं। व्यास जैसे महर्षि उनके चरणकमलों की तलाश करते और उन्हें पूजते हैं। तो भी कुछ ऐसे मूर्ख हैं, जो कृष्ण को सामान्य मनुष्य मानते हैं।
 
तात्पर्य
 गुरु को समझने के प्रसंग में भगवान् कृष्ण के परमेश्वर होने का उदाहरण उपयुक्त है। गुरु सेवक-भगवान् कहलाता है और कृष्ण सेव्य-भगवान् कहलाते हैं जिनकी सेवाकी जानी चाहिए। गुरु पूजक ईश है और भगवान् कृष्ण पूज्य ईश हैं। गुरु और भगवान् में यही अन्तर है।
दूसरी बात—जिस भगवद्गीता में भगवान् का उपदेश है, वह बिना किसी हेर-फेर के यथार्थ रूप में गुरु द्वारा प्रस्तुत की जाती है। अतएव परम सत्य गुरु में विद्यमान रहते हैं। श्लोक २६ में ज्ञानदीपप्रदे कहा गया है। भगवान् समूचे विश्व को असली ज्ञान देते हैं और उनके प्रतिनिधि रूप में गुरु इस सन्देश को सारे विश्व में ले जाता है। अतएव चरम पद पर गुरु तथा भगवान् में कोई अन्तर नहीं होता। यदि कोई भगवान् कृष्ण या रामचन्द्र को सामान्य व्यक्ति मानता है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि भगवान् सामान्य व्यक्ति बन गये हैं। इसी प्रकार भगवान् के प्रामाणिक प्रतिनिधि गुरु को यदि उसके परिवार के लोग सामान्य मनुष्य मानते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह सामान्य मनुष्य बन गया है। गुरु भगवान् के तुल्य है अतएव जो आध्यात्मिक प्रगति करने के गम्भीरता पूर्वक इच्छुक हों उन्हें गुरु को इसी तरह मानना चाहिए। इस समझ में थोड़ा भी हेर-फेर होने से शिष्य के वैदिक अध्ययन तथा तप में विनाश हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥