श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 28

 
श्लोक
षड्‌‌वर्गसंयमैकान्ता: सर्वा नियमचोदना: ।
तदन्ता यदि नो योगानावहेयु: श्रमावहा: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
षट्-वर्ग—छ: तत्त्व, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा छठा मन; संयम-एकान्ता:—इन्द्रिय-दमन का चरम लक्ष्य; सर्वा:—ऐसे सारे कार्यकलाप; नियम-चोदना:—इन्द्रियों तथा मन को वश में करने के लिए अन्य विधान; तत्-अन्ता:—ऐसे कार्यकलापों का चरमलक्ष्य; यदि—यदि; नो—नहीं; योगान्—ब्रह्म के साथ जुडऩे की कड़ी; आवहेयु:—ले जाती है; श्रम-आवहा:—समय तथा श्रम का अपव्यय ।.
 
अनुवाद
 
 अनुष्ठान (कर्मकाण्ड), विधि-विधान, तपस्या तथा योगाभ्यास—ये सभी इन्द्रियों तथा मन को वश में करने के लिए हैं, किन्तु इन्द्रियों तथा मन को वश में कर लेने के बाद भी यदि वह भगवान् का ध्यान नहीं करता तो ये सारे कार्यकलाप श्रम के अपव्यय मात्र हैं।
 
तात्पर्य
 कोई यह तर्क कर सकता है कि योगाभ्यास से तथा वैदिक नियमों के अनुसार कर्मकाण्ड करने से गुरु की एकान्त भक्ति किये बिना ही मनुष्य को जीवन के चरम लक्ष्य—परमात्मा—की अनुभूति प्राप्त हो सकती है। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि योगाभ्यास से मनुष्य को भगवान् के चिन्तन पद तक पहुँचना चाहिए। जैसाकि शास्त्रों में कहा गया है—ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिन:—ध्यान में लीन मनुष्य योगाभ्यास में सिद्धि प्राप्त करता है तब उसे भगवान् के दर्शन होते हैं। मनुष्य अनेक प्रकार के अभ्यासों से इन्द्रियों को वश में करने की स्थिति में पहुंच सकता है किन्तु इन्द्रियों को वश में करने मात्र से ही कोई ठोस निष्कर्ष को प्राप्त नहीं होता। किन्तु गुरु तथा भगवान् में एकान्त श्रद्धा होने से मनुष्य न केवल इन्द्रियों को वश में करता है, अपितु भगवान् की अनुभूति भी कर लेता है—
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।

तस्यैते कथिता ह्यर्था: प्रकाशन्ते महात्मन: ॥

“जो लोग भगवान् तथा गुरु दोनों पर निर्विवाद श्रद्धा रखते हैं उन्हीं महात्माओं को वैदिक ज्ञान का आशय स्वत: प्रकट होता है।” (श्वेताश्वतर उपनिषद ६.२३) आगे भी कहा गया है—तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया तथा तरन्त्यञ्जो भवार्णवम्। गुरु की सेवा करने मात्र से ही अज्ञान के सागर को पार करके भगवद्धाम को लौटा जा सकता है। तब उसे क्रमश: भगवान् के साक्षात् दर्शन होते हैं और वह भगवान् की संगति में जीवन का भोग कर सकता है। योग का चरम लक्ष्य भगवान् के सम्पर्क में आना है। जब तक इसकी प्राप्ति न हो तब तक तथाकथित योगाभ्यास व्यर्थ का श्रम है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥