श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 3

 
श्लोक
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि श्राद्धे कुर्यान्न विस्तरम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
द्वौ—दो; दैवे—देवताओं को आहुति देते समय; पितृ-कार्ये—श्राद्ध कर्म करते समय, जिसमें पितरों को आहुति दी जाती है; त्रीन्—तीन; एक—एक; एकम्—एक; उभयत्र—दोनों अवसरों पर; वा—अथवा; भोजयेत्—भोजन दे; सु-समृद्ध: अपि— भले ही वह अत्यन्त धनी हो; श्राद्धे—पितरों को आहुतियाँ देते समय; कुर्यात्—करे; न—नहीं; विस्तरम्—विशद व्यवस्था ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि देवताओं को आहुति देते समय केवल दो ब्राह्मणों को और पितरों को आहुति देते समय तीन ब्राह्मणों को आमंत्रित करे। अथवा इन दोनों में केवल एक-एक ब्राह्मण काफी होगा। कोई कितना ही ऐश्वर्यवान क्यों न हो, उसे अधिक ब्राह्मण नहीं आमंत्रित करने चाहिए या इन अवसरों पर अत्यन्त खर्चीली व्यवस्था नहीं करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 जैसाकि हम पहले बता चुके हैं, श्रील अद्वैत आचार्य ने पितरों के श्राद्ध-कर्म के समय केवल हरिदास ठाकुर को आमंत्रित किया था। इस तरह उन्होंने इस सिद्धान्त न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्त: श्वपच: प्रिय: का पालन किया। भगवान् कहते हैं, “मेरा भक्त बनने के लिए वैदिक ज्ञान में पारंगत होना आवश्यक नहीं है। भले ही कोई श्वपच (कुत्ता खाने वाला) परिवार में क्यों न उत्पन्न
हो, वह ऐसे परिवार में जन्म ले करके भी मेरा भक्त बन सकता है और वह मुझे अत्यन्त प्रिय होता है। अतएव मेरे भक्त को भेंट दी जानी चाहिए और मेरा भक्त मुझे जो भी चढ़ाता है उसे स्वीकार करना चाहिए।” इस सिद्धान्त का पालन करते हुए मनुष्य को चाहिए कि उच्चकोटि के ब्राह्मण या वैष्णव को आमंत्रित करे और अपने पितरों का श्राद्ध-कर्म करते समय उसे ही भोजन कराए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥