श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 35

 
श्लोक
कामादिभिरनाविद्धं प्रशान्ताखिलवृत्ति यत् ।
चित्तं ब्रह्मसुखस्पृष्टं नैवोत्तिष्ठेत कर्हिचित् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
काम-आदिभि:—विभिन्न कामेच्छाओं से; अनाविद्धम्—अप्रभावित; प्रशान्त—शान्त; अखिल-वृत्ति—हर तरह से अथवा सारे कार्यों में; यत्—जो; चित्तम्—चेतना; ब्रह्म-सुख-स्पृष्टम्—शाश्वत आनन्द के दिव्य पद पर स्थित; न—नहीं; एव—निस्सन्देह; उत्तिष्ठेत—बाहर आ सकता है; कर्हिचित्—किसी समय ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य की चेतना भौतिक कामेच्छाओं से अदूषित होती है, तो वह सभी कार्यों में शान्त हो जाती है, क्योंकि मनुष्य नित्य आनन्दमय जीवन को प्राप्त होता है। एक बार इस पद पर स्थित हो जाने पर मनुष्य फिर भौतिक कार्यकलापों की ओर वापस नहीं जाता।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मसुखस्पृष्टम् का वर्णन भगवद्गीता में भी (१८.५४) हुआ है—
ब्रह्मभूत प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥

“जो दिव्य पद पर स्थिर है उसे तुरन्त परब्रह्म की अनुभूति हो जाती है और वह पूरी तरह प्रसन्न हो जाता है। वह न तो शोच करता है व कभी किसी वस्तु की इच्छा करता है; वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। इस स्थिति में वह दिव्य कार्यकलाप या भगवद्भक्ति प्रारम्भ करता है।” सामान्यतया एक बार ब्रह्मसुख को प्राप्त मनुष्य फिर कभी नीचे नहीं आता। किन्तु यदि कोई भक्ति नहीं करता तो भौतिक जगत में वापस आने की सम्भावना बनी रहती है। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं तत: पतन्त्यधोऽनादृत युष्मदङ्घ्रय:—मनुष्य ब्रह्मसुख पद तक ऊपर जा सकता है, किन्तु वह वहाँ से भी भौतिक जगत में गिर सकता है यदि वह अपने को भक्ति में नहीं लगाता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥