श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 37

 
श्लोक
यै: स्वदेह: स्मृतोऽनात्मा मर्त्यो विट्कृमिभस्मवत् ।
त एनमात्मसात्कृत्वा श्लाघयन्ति ह्यसत्तमा: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
यै:—जिन संन्यासियों द्वारा; स्व-देह:—अपना शरीर; स्मृत:—मानते हैं; अनात्मा—आत्मा से भिन्न; मर्त्य:—मृत्यु से प्रभावित; विट्—मल या विष्ठा बन कर; कृमि—कीड़े-मकोड़े; भस्म-वत्—या राख के सदृश; ते—ऐसे लोग; एनम्—इस शरीर को; आत्मसात् कृत्वा—फिर से अपने साथ पहचान करके; श्लाघयन्ति—अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कह कर महिमा गाते हैं; हि—निस्सन्देह; असत्-तमा:—सबसे बड़े धूर्त ।.
 
अनुवाद
 
 जो संन्यासी पहले यह समझते हैं कि शरीर मर्त्य है और यह विष्ठा, कृमि या राख में परिणत हो जाएगा किन्तु जो पुन: शरीर को महत्त्व प्रदान करते हैं तथा आत्मा कहकर उसका गुणगान करते हैं उन्हें सबसे बड़ा धूर्त मानना चाहिए।
 
तात्पर्य
 संन्यासी वह होता है, जो ज्ञान में उन्नति करके यह भलीभाँति समझ चुका है कि ब्रह्म स्वयं आत्मा है, शरीर नहीं। जिसे यह समझ है, वह संन्यास ग्रहण कर सकता है, क्योंकि वह अहं ब्रह्मास्मि पद पर स्थित होता है। ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। जो व्यक्ति न तो शोच करता है न अपने शरीर के पालन करने की लालसा करता है, किन्तु सभी जीवों को आत्मा के रूप में स्वीकार कर सकता है, वह भगवान् की भक्ति कर सकता है। यदि वह भगवद्भक्ति में प्रवेश नहीं करता, अपितु यह समझे बिना कि आत्मा तथा शरीर भिन्न हैं बनावटी तौर पर अपने को ब्रह्म या नारायण मानता है, तो वह निश्चित रूप से नीचे गिरता है (पतन्त्यध:)। ऐसा व्यक्ति फिर से शरीर को महत्त्व प्रदान करता है। भारत में ऐसे अनेक संन्यासी हैं, जो शरीर को महत्त्व प्रदान करते हैं और उन में से कुछ निर्धन मनुष्य के शरीर को विशेष महत्त्व देते हुए उसे दरिद्र नारायण के रूप में स्वीकार करते हैं मानो नारायण के भौतिक शरीर होता हो। अन्य अनेक संन्यासी शरीर की सामाजिक स्थिति के महत्त्व पर
बल देते हैं—यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र। ऐसे संन्यासी सबसे बड़े धूर्त (असत्तमा:) समझे जाते हैं। वे निर्लज्ज हैं, क्योंकि उन्हें अभी तक शरीर तथा आत्मा का अन्तर ज्ञात नहीं हो पाया है और उल्टे वे ब्राह्मण के शरीर को ही ब्राह्मण मानते हैं। ब्राह्मणत्व ब्रह्म के ज्ञान में निहित है। ब्राह्मण का शरीर ब्रह्म नहीं है। इसी प्रकार शरीर न तो धनी होता है न दरिद्र। यदि दरिद्र का शरीर दरिद्र नारायण होता तो फिर धनाढ्य व्यक्ति का शरीर धनी नारायण कहलाता। अतएव जो संन्यासी नारायण का अर्थ नहीं जानते, जो शरीर को ब्रह्म या नारायण मानते हैं, वे यहाँ पर अत्यन्त घृणित धूर्तों के रूप में (असत्तमा:) वर्णित किए गये हैं। देहात्मबुद्धि के वशीभूत हुए ऐसे संन्यासी शरीर की सेवा करने के विविध कार्यक्रम बनाते हैं। वे तथाकथित धार्मिक कृत्यों की हास्यास्पद संस्थाओं का संचालन करकेजनता को गुमराह करते हैं। यहाँ पर ऐसे संन्यासियों को अपत्रप: तथा असत्तमा: अर्थात् निर्लज्ज तथा आध्यात्मिक जीवन से पतित कहा गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥