श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 38-39

 
श्लोक
गृहस्थस्य क्रियात्यागो व्रतत्यागो वटोरपि ।
तपस्विनो ग्रामसेवा भिक्षोरिन्द्रियलोलता ॥ ३८ ॥
आश्रमापसदा ह्येते खल्वाश्रमविडम्बना: ।
देवमायाविमूढांस्तानुपेक्षेतानुकम्पया ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
गृहस्थस्य—गृहस्थ जीवन में स्थित व्यक्ति का; क्रिया-त्याग:—गृहस्थ के कर्तव्य को छोडऩा; व्रत-त्याग:—व्रतों तथा तपस्या का त्याग; वटो:—ब्रह्मचारी के लिए; अपि—भी; तपस्विन:—वानप्रस्थ के लिए, वह जिसने तप युक्त जीवन स्वीकार किया है; ग्राम-सेवा—गाँव में रहकर लोगों की सेवा करना; भिक्षो:—भीख माँग कर रहने वाले संन्यासी के लिए; इन्द्रिय-लोलता— इन्द्रियभोग में अनुरक्ति; आश्रम—आश्रम का; अपसदा:—अत्यन्त गर्हित; हि—निस्सन्देह; एते—ये सब; खलु—निस्सन्देह; आश्रम-विडम्बना:—विभिन्न आश्रमों का अनुसरण करते और धोखा देते; देव-माया-विमूढान्—भगवान् की बहिरंगा शक्ति के द्वारा मोहग्रस्तों को; तान्—उन; उपेक्षेत—उपेक्षा करे और प्रमाणित न माने; अनुकम्पया—अथवा दया द्वारा (उन्हें असली जीवन की शिक्षा दे) ।.
 
अनुवाद
 
 गृहस्थ आश्रम में रहने वाले व्यक्ति के लिए विधि-विधानों का परित्याग करना, गुरु के संरक्षण में रहते हुए ब्रह्मचारी के लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन न करना, वानप्रस्थ के लिए गाँव में रहना और तथाकथित सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहना अथवा संन्यासी के लिए इन्द्रियतृप्ति में अनुरक्त रहना निन्दनीय हैं। जो ऐसा करता है, वह अत्यन्त निम्न श्रेणी का माना जाता है। ऐसा दिखावटी व्यक्ति भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहग्रस्त रहता है। मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसे व्यक्ति को किसी भी पद से निकाल दे या हो सके तो उस पर दया करके उसे शिक्षा दे जिससे वह अपने मूल पद पर वापस चला जाए।
 
तात्पर्य
 हमने बारम्बार जोर देकर यह बात कही है कि मानव संस्कृति तब तक प्रारम्भ नहीं होगी जब तक मनुष्य वर्णाश्रम धर्म के सिद्धान्तों को ग्रहण नहीं करता। यद्यपि गृहस्थ जीवन में विषय भोग के लिए छूट है, किन्तु कोई भी व्यक्ति गृहस्थ जीवन के विधि-विधानों का पालन किये बिना यौन सुख नहीं उठा सकता। इसी तरह ब्रह्मचारी को गुरु के संरक्षण में रहना चाहिए—ब्रह्मचारी गुरुकुले वसन् दान्तो गुरोर्हितम्। यदि ब्रह्मचारी अपने गुरु के संरक्षण
में नहीं रहता यदि वानप्रस्थी सामान्य कार्यों में लगता है या संन्यासी लालची होता है और जीभ के स्वाद के लिए मांस, अण्डा तथा व्यर्थ की सभी वस्तुएँ खाता है, तो वह वञ्चक है और तुरन्त ही उसे महत्त्वहीन समझ कर त्याग देना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों पर अनुकम्पा की जानी चाहिए और यदि किसी में पर्याप्त बल हो तो ऐसे व्यक्तियों को जीवन के गलत मार्ग पर चलने से रोकना चाहिए। अन्यथा उनका बहिष्कार करके और उन पर कोई ध्यान नहीं देना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥