श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 40

 
श्लोक
आत्मानं चेद्विजानीयात्परं ज्ञानधुताशय: ।
किमिच्छन्कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पट: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
आत्मानम्—आत्मा तथा परमात्मा को; चेत्—यदि; विजानीयात्—समझ सकता है; परम्—दिव्य, इस जगत से परे; ज्ञान—ज्ञान से; धुत-आशय:—जिसने अपनी चेतना विमल कर ली है; किम्—क्या; इच्छन्—भौतिक सुविधाओं की इच्छा करते हुए; कस्य—किसके लिए; वा—अथवा; हेतो:—किस कारण से; देहम्—भौतिक शरीर को; पुष्णाति—पालन-पोषण करता है; लम्पट:—अवैध रूप से इन्द्रियतृप्ति में अनुरक्त रहकर ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य का शरीर आत्मा तथा परमात्मा को जानने के निमित्त होता है और ये दोनों आध्यात्मिक पद पर स्थित हैं। यदि उच्च ज्ञान से परिष्कृत हुए व्यक्ति द्वारा इन दोनों को जाना जा सकता है, तो फिर मूर्ख तथा लालची व्यक्ति किसके लिए और किस कारण से इस शरीर का पालन इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है?
 
तात्पर्य
 निस्सन्देह, इस जगत में प्रत्येक व्यक्ति इन्द्रियतृप्ति के लिए शरीर का पालनपोषण करने में रुचि रखता है, किन्तु ज्ञान के अनुशीलन से मनुष्य धीरे-धीरे यह जान लेना चाहिए कि शरीर आत्मा नहीं है। आत्मा तथा परमात्मा दोनों ही भौतिक जगत से परे हैं। इसे मनुष्य जीवन में, विशेष रूप से जब कोई संन्यास ग्रहण करता है, समझ लेना चाहिए। जिस संन्यासी ने आत्मा को समझ लिया है उसे आत्मा को ऊपर उठाने तथा परमात्मा की संगति करने में लगना चाहिए। हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन जीव को ऊपर उठाकर भगवद्धाम वापस ले जाने के निमित्त है। ऐसे उत्थान
के लिए प्रयास करना मनुष्य जीवन का कर्तव्य है। जब कोई अपना यह कर्तव्य पूरा नहीं करता, तो वह शरीर का पालन क्यों करे? विशेष रूप से जब संन्यासी न केवल साधारण उपायों द्वारा शरीर पालन की चेष्टा करता है, अपितु मांसाहार तथा अन्य गर्हित वस्तुओं के द्वारा शरीर का पालन करता है, तो वह लम्पट होता है—ऐसा लालची व्यक्ति जो इन्द्रियतृप्ति मात्र में लगा रहता है। संन्यासी को जीभ, पेट तथा प्रजनन इन्द्रियों की सारी प्रेरणाओं से विलग हो जाना चाहिए, क्योंकि ये तब तक विचलित करती हैं जब तक वह यह नहीं जान लेता कि शरीर आत्मा से भिन्न है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥