श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 41

 
श्लोक
आहु: शरीरं रथमिन्द्रियाणि
हयानभीषून्मन इन्द्रियेशम् ।
वर्त्मानि मात्रा धिषणां च सूतं
सत्त्वं बृहद् बन्धुरमीशसृष्टम् ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
आहु:—कहा गया है; शरीरम्—शरीर को; रथम्—रथ; इन्द्रियाणि—इन्द्रियों को; हयान्—घोड़े; अभीषून्—लगाम; मन:— मन; इन्द्रिय—इन्द्रियों का; ईशम्—स्वामी; वर्त्मानि—लक्ष्य; मात्रा:—इन्द्रियविषय; धिषणाम्—बुद्धि को; च—तथा; सूतम्— सारथी, रथ हाँकने वाला; सत्त्वम्—चेतना को; बृहत्—महान; बन्धुरम्—बन्धन; ईश—परमेश्वर द्वारा; सृष्टम्—रचा गया ।.
 
अनुवाद
 
 ज्ञान में बढ़े-चढ़े अध्यात्मवादी भगवान् के आदेश से बने शरीर की तुलना रथ से करते हैं; इन्द्रियाँ घोड़ों के तुल्य हैं; इन्द्रियों का स्वामी मन लगाम सदृश है, इन्द्रियविषय गन्तव्य हैं, बुद्धि सारथी है और सारे शरीर में व्याप्त चेतना इस भौतिक जगत के बन्धन का कारण है।
 
तात्पर्य
 भौतिकतावादी जीवन में मोहग्रस्त व्यक्ति के लिए इन्द्रियतृप्ति में लगे शरीर, मन तथा इन्द्रियाँ बारम्बार जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग के बन्धन के कारण हैं। किन्तु जो अध्यात्मज्ञानी हैं, उनके लिए वही शरीर, इन्द्रियाँ तथा मन मुक्ति के कारण हैं। इसकी पुष्टि कठोपनिषद् (१.३.३-४, ९) में की गई है—
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् सोऽध्वन: पारमाप्नोति तद्विष्णो: परमं पदम्।

आत्मा शरीर रूपी रथ का स्वामी है, जिसका सारथी बुद्धि है। मन गंतव्य तक पहुँचने का संकल्प है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं और इन्द्रियविषय इसी कार्य में सम्मिलित हैं। इस प्रकार मनुष्य गन्तव्य विष्णु तक पहुँच सकता है, जो जीवन के परम लक्ष्य हैं (परमं पदम् )। बद्ध जीवन में शरीर की चेतना बन्धन का कारण है, किन्तु यही चेतना जब कृष्णभावनामृत में रूपान्तरित होती है, तो यह सबों के भगवद्धाम लौटने का कारण बनती है।

इसलिए मनुष्य-शरीर का उपयोग दो प्रकार से किया जा सकता है—अज्ञान के गहनतम भागों में जाने या भगवद्धाम वापस जाने के लिए। भगवद्धाम जाने का मार्ग महत्-सेवा अर्थात् स्वरूपसिद्ध गुरु स्वीकार करना है। महत् सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते:। मुक्ति के लिए प्रामाणिक भक्तों के निर्देश मानने चाहिए क्योंकि वे ही पूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाले हैं। दूसरी ओर, तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्—यदि संसार के गहनतम भागों में जाना हो तो स्त्रियों के प्रति आसक्त पुरुषों की संगति करता रहे (योषितां सङ्गिसङ्गम् )। योषित् शब्द का अर्थ है “स्त्री”। जो लोग अत्यधिक भौतिकतावादी होते हैं, वे स्त्रियों पर आसक्त रहते हैं।

इसीलिए कहा गया है—आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च। यह शरीर रथ के समान है, जिससे कहीं भी जाया जा सकता है। चाहे इसे कुशलता से चलाए या फिर मनमाने ढंग से—तब वह किसी खड्डे में गिर सकता है। दूसरे शब्दों में, यदि कोई अनुभवी गुरु से आदेश ग्रहण करता है, तो वह भगवद्धाम वापस जा सकता है, अन्यथा जन्म-मृत्यु के चक्कर में फँस जाता है। अतएव कृष्ण उपदेश देते हैं—

अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥

“जो लोग भक्ति के मार्ग पर श्रद्धालु नहीं हैं, हे शत्रुओं के विजेता! वे मुझे नहीं पा सकते, अपितु इस संसार में जन्म-मरण में लौट आते हैं।” (भगवद्गीता ९.३) साक्षात् भगवान् उपदेश देते हैं कि कोई किस प्रकार भगवद्धाम लौट सकता है, किन्तु यदि कोई उनके उपदेशों पर ध्यान नहीं देता तो वह भगवद्धाम वापस न जाकर इसी संसार में जन्म-मृत्यु के दुखमय चक्र में जीवन बिताता है (मृत्युसंसारवर्त्मनि )।

अतएव अनुभवी अध्यात्मवादियों की सलाह है कि शरीर को जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त करने में लगाए रखा जाए (स्वार्थगतिम् )। जीवन का वास्तविक लक्ष्य तो भगवद्धाम वापस जाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेक वैदिक ग्रंथ हैं यथा वेदान्त सूत्र, उपनिषद, भगवद्गीता, महाभारत तथा रामायण। मनुष्य को इन वैदिक ग्रंथों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए और निवृत्ति मार्ग का अभ्यास करना चाहिए। तभी उसका जीवन सफल हो सकेगा। शरीर तभी तक महत्त्वपूर्ण है जब तक उसमें चेतना है। चेतनाहीन शरीर पदार्थ का पिंड है। अतएव भगवद्धाम वापस जाने के लिए मनुष्य की चेतना ही उसके भवबन्धन का कारण है किन्तु यदि इस चेतना को भक्तियोग से शुद्ध कर दिया जाय तो उसे अपनी उपाधि की—कि वह भारतीय, अमरीकी, मुसलमान, क्रिस्तानी है—असत्यता का बोध हो सकेगा। सर्वोपाधि विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्। मनुष्य को सारी उपाधियाँ भूलकर अपनी चेतना का उपयोग कृष्ण की सेवा में करना चाहिए। अतएव यदि कोई कृष्णभावनामृत आन्दोलन का लाभ उठाए तो उसका जीवन निश्चित रूप से सफल हो जाए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥