श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 42

 
श्लोक
अक्षं दशप्राणमधर्मधर्मौ
चक्रेऽभिमानं रथिनं च जीवम् ।
धनुर्हि तस्य प्रणवं पठन्ति
शरं तु जीवं परमेव लक्ष्यम् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
अक्षम्—अरा (रथ के पहिये के); दश—दस; प्राणम्—शरीर के भीतर प्रवाहित होने वाली दस प्रकार की वायु; अधर्म— अधर्म; धर्मौ—तथा धर्म (पहिए के ऊपरी तथा निचले भाग); चक्रे—पहिए में; अभिमानम्—मिथ्या पहचान; रथिनम्—रथ का स्वामी या शरीर का स्वामी; च—भी; जीवम्—जीव; धनु:—धनुष; हि—निस्सन्देह; तस्य—उसका; प्रणवम्—वैदिक ओङ्कार मंत्र; पठन्ति—कहा जाता है; शरम्—तीर; तु—लेकिन; जीवम्—जीव; परम्—परमेश्वर; एव—निस्सन्देह; लक्ष्यम्—लक्ष्य ।.
 
अनुवाद
 
 शरीर के भीतर कार्यशील दस प्रकार की वायुओं की तुलना रथ के पहिए के अरों (तीलियों) से की गई है और इस पहिए के ऊपरी तथा निचले भाग धर्म तथा अधर्म कहलाते हैं। देहात्मबुद्धि में रहने वाला जीव रथ का स्वामी है। वैदिक प्रणव मंत्र ही धनुष है, साक्षात् शुद्ध जीव तीर है और परम पुरुष उसका लक्ष्य है।
 
तात्पर्य
 शरीर के भीतर दस प्रकार की वायुओं का संचार सदा होता रहता है। इनके नाम हैं— प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय। इनकी तुलना यहाँ रथ के पहिए के अरों से की गई है। प्राणवायु जीवों के समस्त कार्यकलापों की शक्ति है और ये कार्यकलाप कभी धार्मिक होते हैं, तो कभी अधार्मिक। इस प्रकार धर्म तथा अधर्म रथ के पहियों के ऊपरी तथा निचले भाग कहे जाते हैं। जब जीव भगवद्धाम जाने का निश्चय करता है, तो उसका लक्ष्य भगवान् विष्णु रहता है। बद्धावस्था में मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि उसका जीवन-लक्ष्य परमेश्वर है। न ते विदु: स्वार्थगगतिं हि विष्णु: दुराशया ये बहिरर्थमानिन:। जीव इस भौतिक जगत में सुखी रहने का प्रयास करता है किन्तु अपने जीवन-लक्ष्य को नहीं जान पाता। किन्तु जब वह जीवात्मा शुद्ध हो जाता है, तो वह देहात्मबुद्धि की धारणा को त्याग देता है और वह अपने को किसी जाति, राष्ट्र, समाज, परिवार इत्यादि से सम्बन्धित होने की झूठी पहचान को त्याग देता है (सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम् )। तब वह अपने विमल जीवन का तीर लेकर प्रणव या हरे कृष्ण मंत्र के दिव्य कीर्तन रूपी धनुष की सहायता से अपने आपको भगवान् की ओर फेंकता है।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने टीका की है कि चूँकि इस श्लोक में धनुष और बाण शब्द आये हैं अतएव कोई यह तर्क कर सकता है कि भगवान् तथा जीव परस्पर शत्रु हो गए हैं। यद्यपि भगवान् जीव का तथाकथित शत्रु बन सकता है किन्तु यह भगवान् का वीररस से युक्त विनोद है। उदाहरणार्थ भगवान् ने भीष्म से युद्ध किया और जब भीष्म ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान् के शरीर को तीरों से बेध डाला तो यह बारह प्रकार के भावों में से एक प्रकार का विनोद-भाव या सम्बन्ध था। जब बद्धजीव भगवान् पर तीर चला कर उन तक पहुँचना चाहता है, तो भगवान् को आनन्द मिलता है और जीव को भगवद्धाम जाने का लाभ मिलता है। इस सम्बन्ध में दिया गया दूसरा उदाहरण अर्जुन का है, जिसने आधार मीन या चक्र के भीतर लगी मछली को वेध कर द्रौपदी की संगति प्राप्त की। इसी प्रकार यदि कोई भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन रूपी बाण से भगवान् विष्णु के चरणकमलों को वेध देता है, तो उसे भक्ति के इस शौर्यपूर्ण कार्य के लिए भगवद्धाम वापस जाने का लाभ मिलता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥