श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 47

 
श्लोक
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।
आवर्तते प्रवृत्तेन निवृत्तेनाश्नुतेऽमृतम् ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
प्रवृत्तम्—भौतिक भोग के लिए झुकाव; च—तथा; निवृत्तम्—भौतिक भोग का अन्त; च—तथा; द्वि-विधम्—इन दो प्रकारों; कर्म—कर्मों का; वैदिकम्—वेदों द्वारा संस्तुत; आवर्तते—संसार के चक्र में ऊपर-नीचे घूमता है; प्रवृत्तेन—भौतिक कार्यकलापों के भोग की प्रवृत्ति द्वारा; निवृत्तेन—ऐसे कार्यों को बन्द करने से; अश्नुते—भोग करता है; अमृतम्—शाश्वत जीवन ।.
 
अनुवाद
 
 वेदों के अनुसार प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दो प्रकार के कार्यकलाप होते हैं—प्रवृत्ति कार्यों का अर्थ है अपने को भौतिकतावादी जीवन की निम्नतर अवस्था से उच्चतर अवस्था तक उठाना जबकि निवृत्ति का अर्थ है भौतिक इच्छा का अन्त। प्रवृत्ति कार्यों से मनुष्य भौतिक बन्धन में कष्ट उठाता है, किन्तु निवृत्ति कार्यों से वह शुद्ध हो जाता है और नित्य आनन्दमय जीवन को भोगने के योग्य बनता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (१६.७) में पुष्टि की गई है—प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा:—असुर या अभक्त प्रवृत्ति तथा निवृत्ति के अन्तर को नहीं जान सकते। वे जो चाहते हैं करते हैं। ऐसे लोग अपने को प्रबल प्रकृति से स्वतंत्र मानते हैं; अतएव वे अनुत्तरदायी होते हैं और पुण्य कर्म करने की परवाह नहीं करते। निस्सन्देह, वे पाप तथा पुण्य कर्म में अन्तर नहीं कर पाते। भक्ति कभी पुण्य या पाप कर्म पर निर्भर नहीं करती। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.२.६) में कहा गया है— स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥

“सारी मानवता का परम धर्म वह है, जिससे मनुष्य दिव्य भगवान् की प्रेमा-भक्ति प्राप्त कर सकें। ऐसी भक्ति आत्मा को पूरी तरह तुष्ट करने के लिए अहैतुकी तथा अप्रतिहत होनी चाहिए।” फिर भी जो लोग पुण्यकर्म करते हैं उनके भक्त बनने की सम्भावना अधिक है। जैसाकि भगवद्गीता (७.१६) में कृष्ण कहते हैं—चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन—हे अर्जुन! चार प्रकार के पुणात्मा लोग मेरी भक्ति करते हैं। यदि कोई किसी भौतिक उद्देश्य से भी भक्ति करता है, तो भी वह पुण्यात्मा समझा जाता है और चूँकि वह कृष्ण के पास आया है, अतएव वह क्रमश: भक्ति की अवस्था तक पहुँच जाएगा। तब वह ध्रुव महाराज की भाँति भगवान् से कोई भौतिक वरदान स्वीकार करने से इनकार कर देगा (स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे )। अतएव भौतिक प्रवृत्ति होने पर भी मनुष्य कृष्ण-बलराम या गौर-निताइ के चरणकमलों की शरणग्रहण कर सकता है, जिससे वह सारी भौतिक इच्छाओं से तुरन्त शुद्ध हो सके (क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति )। जब मनुष्य पाप तथा पुण्य कर्मों की प्रवृत्तियों से मुक्त हो जाता है, तो वह वापस भगवद्धाम जाने का पूर्ण सुपात्र बन जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥