श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 5

 
श्लोक
देशे काले च सम्प्राप्ते मुन्यन्नं हरिदैवतम् ।
श्रद्धया विधिवत्पात्रे न्यस्तं कामधुगक्षयम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
देशे—उचित स्थान पर यथा तीर्थस्थान पर; काले—शुभ समय पर; च—भी; सम्प्राप्ते—प्राप्त होने पर; मुनि-अन्नम्—घी से तैयार भोजन जो बड़े-बड़े मुनियों के खाने के योग्य हो; हरि-दैवतम्—भगवान् हरि को; श्रद्धया—प्रेम तथा स्नेह से; विधि वत्—गुरु तथा शास्त्रों के आदेशानुसार; पात्रे—उपयुक्त व्यक्ति में; न्यस्तम्—अर्पित किया गया; कामधुक्—सम्पन्नता का साधन बन जाता है; अक्षयम्—अक्षय, अविनाशी ।.
 
अनुवाद
 
 जब उपयुक्त शुभ अवसर तथा स्थान प्राप्त हो तो मनुष्य को चाहिए कि अत्यन्त प्रेमपूर्वक भगवान् के अर्चाविग्रह को घी में बना भोजन अर्पित करे और फिर उपयुक्त व्यक्ति अर्थात् वैष्णव या ब्राह्मण को प्रसाद दे। इससे अक्षय समृद्धि आएगी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥