श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 56

 
श्लोक
य एते पितृदेवानामयने वेदनिर्मिते ।
शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि न मुह्यति ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; एते—इस मार्ग पर (जो ऊपर बताया गया है); पितृ-देवानाम्—पितृयान तथा देवयान नामक; अयने—इस मार्ग पर; वेद-निर्मिते—वेदों में बताये गये; शास्त्रेण—शास्त्रों के नियमित अध्ययन से; चक्षुषा—जाग्रत आँखों से; वेद—पूर्णतया अवगत है; जन-स्थ:—शरीर में स्थित व्यक्ति; अपि—यद्यपि; न—कभी नहीं; मुह्यति—मोहग्रस्त होता है ।.
 
अनुवाद
 
 इस भौतिक शरीर में स्थित रहते हुए भी जो पितृयान तथा देवयान मार्गों से पूर्णतया अवगत रहता है और जिसकी आँखें वैदिक ज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार खुली रहती हैं वह भौतिक जगत में कभी मोहग्रस्त नहीं होता।
 
तात्पर्य
 आचार्यवान् पुरुषो वेद—जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु द्वारा मार्गदर्शित होता है, वह वेदों में वर्णित प्रत्येक वस्तु को जानता है क्योंकि वेद ही अच्युत ज्ञान का मानदण्ड स्थापित करते हैं। जैसाकि भगवद्गीता में संस्तुत
किया गया है—तद्विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्—मनुष्य को चाहिए कि आचार्य के पास जाए, तभी उसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। गुरु द्वारा मार्गदर्शन होने पर मनुष्य को जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥