श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 57

 
श्लोक
आदावन्ते जनानां सद् बहिरन्त: परावरम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं वचो वाच्यं तमो ज्योतिस्त्वयं स्वयम् ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
आदौ—प्रारम्भ में; अन्ते—अन्त में; जनानाम्—सभी जीवों का; सत्—सदैव विद्यमान; बहि:—बाहर; अन्त:—भीतर से; पर— दिव्य; अवरम्—पदार्थ; ज्ञानम्—ज्ञान; ज्ञेयम्—लक्ष्य; वच:—वाणी, अभिव्यक्ति; वाच्यम्—चरम लक्ष्य; तम:—अँधेरा; ज्योति:—प्रकाश; तु—निस्सन्देह; अयम्—यह (भगवान्); स्वयम्—स्वयं ।.
 
अनुवाद
 
 जो भीतर बाहर, सभी वस्तुओं तथा जीवों के प्रारम्भ तथा अन्त में, भोग्य तथा भोक्ता के रूप में, उच्च तथा नीच के रूप में विद्यमान है, वह परम सत्य है। वह सदैव ज्ञान तथा ज्ञेय, अभिव्यक्ति तथा अभिज्ञेय, अंधकार तथा प्रकाश के रूप में रहता है। इस तरह वे परमेश्वर सर्वस्व हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर वेदों की इस सूक्ति की व्याख्या की गई है—सर्वं खल्विदं ब्रह्म। चतु: श्लोकी भागवत में भी इसकी व्याख्या है। अहं एवासम् एवाग्रे। परमेश्वर प्रारम्भ में था, वह सृष्टि के बाद भी रहता है और हर एक का पालन करता है और प्रलय के बाद सब कुछ उसी में लीन हो जाता है जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है (प्रकृत्तिं यान्ति मामिकाम् )। इस प्रकार परमेश्वर वास्तव में सर्वस्व है। बद्ध अवस्था में हमारी बुद्धि मोहग्रस्त रहती है किन्तु मुक्ति की पूर्णावस्था में हम यह समझ सकते हैं कि कृष्ण ही प्रत्येक वस्तु के कारण हैं।
ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द विग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“गोविन्द कहे जाने वाले कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक हैं। वे सबों के उद्गम हैं, किन्तु उनका कोई उद्गम नहीं है क्योंकि वे सभी कारणों के कारण हैं।” (ब्रह्म-संहिता ५.१) यह ज्ञान की पूर्णता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥