श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 58

 
श्लोक
आबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृत: ।
दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम् ॥ ५८ ॥
 
शब्दार्थ
आबाधित:—अस्वीकृति; अपि—यद्यपि; हि—निश्चय ही; आभास:—प्रतिबिम्ब; यथा—जिस तरह; वस्तुतया—वास्तविकता के रूप में; स्मृत:—स्वीकृत; दुर्घटत्वात्—वास्तविकता को सिद्ध करना कठिन होने के कारण; ऐन्द्रियकम्—इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान; तद्वत्—उसी तरह; अर्थ—वास्तविकता; विकल्पितम्—कल्पित या संदेहास्पद ।.
 
अनुवाद
 
 दर्पण से प्राप्त सूर्य के प्रतिबिम्ब को मिथ्या माना जा सकता है, किन्तु इसका वास्तविक अस्तित्व तो होता ही है। उसी तरह कल्पना (ज्ञान) द्वारा यह सिद्ध करना कि तत्त्व का कोई अस्तित्व नहीं होता अत्यन्त कठिन होगा।
 
तात्पर्य
 निर्विशेषवादी यह सिद्ध करने के प्रयास में रहता है कि मीमांसक का दृष्टि-भेद गलत होता है। निर्विशेषवादी दर्शन, विवर्तवाद, सामान्यत: साँप को रस्सी स्वीकार करने का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस उदाहरण के अनुसार हमारी दृष्टि के भेद मिथ्या हैं जिस प्रकार देखी गई रस्सी का सर्प होना मिथ्या है। किन्तु वैष्णव का कहना है कि यद्यपि यह विचार कि रस्सी सर्प है मिथ्या है, किन्तु सर्प मिथ्या नहीं है। मनुष्य को वास्तविक सर्प का अनुभव रहता है, अतएव वह जानता है कि यद्यपि रस्सी को साँप मानना मिथ्या या भ्रामक है, किन्तु साँप वास्तविकता है। इसी प्रकार विविधता से पूर्ण यह जगत मिथ्या नहीं है, यह वैकुण्ठ लोक की वास्तविकता का प्रतिबिम्ब है।
दर्पण में सूर्य का प्रतिबिम्ब अंधकार में प्रकाश ही तो होता है, यद्यपि यह यथार्थत: सूर्य प्रकाश नहीं है, किन्तु सूर्य प्रकाश के बिना प्रतिबिम्ब असम्भव है। इसी प्रकार यदि आध्यात्मिक जगत में वास्तविक मूलाकृति न हो तो इस जगत की नाना विविधताएं असम्भव हो जाँय। मायावादी चिन्तक इसे नहीं समझ सकते, किन्तु असली विचारक को यह विश्वास हो जाना चाहिए कि सूर्य प्रकाश की पृष्ठभूमि के बिना प्रकाश सम्भव नहीं है। इस प्रकार मायावादी चिन्तक द्वारा यह सिद्ध करने का वाग्जाल कि यह भौतिक जगत मिथ्या है अननुभवी बालकों को चकीत कराने वाला लग सकता है, लेकिन पूर्ण ज्ञानी व्यक्ति सही-सही जानता है कि कृष्ण के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। अतएव एक वैष्णव कृष्ण को किसी न किसी स्तर पर स्वीकार करने पर बल देता है (तस्मात् केनाप्युपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत् )।

जब हम कृष्ण के चरणकमलों पर अमिश्रित श्रद्धा रखते हैं, तो सब कुछ प्रकट हो जाता है। कृष्ण ने भी भगवद्गीता (७.१) में कहा है—

मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रय:।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥

“हे पृथापुत्र अर्जुन! अब तुम सुनो कि किस प्रकार मेरी पूर्ण चेतना से योगाभ्यास करके और मन को मुझमें आसक्त करके तुम मुझे पूरी तरह संशय रहित होकर समझ सकते हो।” कृष्ण तथा उनके उपदेशों में अटल विश्वास करने मात्र पर ही वास्तविकता समझ में आ सकती है (असंशयं समग्रं माम् )। मनुष्य यह भी जान सकता है कि कृष्ण की भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्तियाँ किस तरह कार्य कर रही हैं। वे सर्वत्र किस प्रकार उपस्थित रहते हैं, यद्यपि प्रत्येक वस्तु उनमें नहीं है। यह अचिन्त्य भेदाभेद दर्शन वैष्णवों का पूर्ण दर्शन है। प्रत्येक वस्तु कृष्ण से उद्भूत है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक वस्तु की पूजा की जाय। मानसिक चिन्तन (ज्ञान) हमें वास्तविकता को उसी रूप में नहीं बताता, वह अपूर्ण बनी रहती है। तथाकथित विज्ञानी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि ईश्वर नहीं है और हर घटना प्रकृति के नियमों के कारण घटती है, किन्तु यह अपूर्ण ज्ञान है, क्योंकि जब तक भगवान् का निर्देशन न हो, कोई भी वस्तु कार्य नहीं कर सकती। इसकी व्याख्या भगवद्गीता (९.१०) में स्वयं भगवान् ने की है—

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद् विपरिवर्तते ॥

“हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य करती है और यह समस्त चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है। यह सृष्टि उसी के नियमानुसार बार बार उत्पन्न होती और विनष्ट होती है।” इस प्रसंग में श्रील मध्वाचार्य की टिप्पणी है—दुर्घटत्वाद् अर्थत्वेन परमेश्वरेणैव कल्पितम्। प्रत्येक वस्तु का आधार भगवान् वासुदेव हैं। वासुदेव: सर्वम् इति स महात्मा सुदुर्लभ:। इसे वहीमहात्मा समझ सकता है, जो पूर्ण ज्ञानी होता है। ऐसा महात्मा विरले ही दिखता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥