श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 59

 
श्लोक
क्षित्यादीनामिहार्थानां छाया न कतमापि हि ।
न सङ्घातो विकारोऽपि न पृथङ्‌‌नान्वितो मृषा ॥ ५९ ॥
 
शब्दार्थ
क्षिति-आदीनाम्—पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वों का; इह—इस संसार में; अर्थानाम्—उन पाँचों तत्त्वों का; छाया—प्रतिबिम्ब; न—न तो; कतमा—इनमें से कौन; अपि—निस्सन्देह; हि—निश्चय ही; न—न तो; सङ्घात:—संयोग; विकार:—रूपान्तर; अपि— यद्यपि; न पृथक्—भिन्न नहीं; न अन्वित:—न तो निहित; मृषा—ये सब सिद्धान्त निरर्थक हैं ।.
 
अनुवाद
 
 इस जगत में पाँच तत्त्व हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश। किन्तु शरीर न तो उनका प्रतिबिम्ब है, न उनका संयोग या उनका रूपान्तर। चूँकि शरीर तथा इसके अवयव न तो पृथक्-पृथक् हैं, न मिश्रित अतएव ऐसे सारे सिद्धान्त निराधार हैं।
 
तात्पर्य
 जंगल पृथ्वी का विकार अवश्य है, किन्तु एक वृक्ष दूसरे वृक्ष पर आश्रित नहीं होता। यदि उनमें से एक काट दिया जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरा वृक्ष भी कट गया। अतएव जंगल न तो वृक्षों का संयोग है, न विकार। इसकी सर्वश्रेष्ठ व्याख्या स्वयं कृष्ण ने की है— मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

“यह समग्र ब्रह्माण्ड मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सारे जीव मुझमें हैं लेकिन मैं उनमें नहीं हूँ।” (भगवद्गीता ९.४) हर वस्तु कृष्ण की शक्ति का विस्तार है। जैसाकि कहा गया है—परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते—भगवान् की विविध शक्तियाँ होती हैं, जो विभिन्न प्रकारों से व्यक्त होती हैं। शक्तियों का अस्तित्व है और भगवान् भी साथ-साथ विद्यमान रहते हैं। चूँकि हर वस्तु उनकी शक्ति है अतएव वे एकसाथ हर वस्तु से अभिन्न हैं और हर वस्तु से भिन्न भी हैं। इस प्रकार हमारे द्वारा कल्पित यह सिद्धान्त कि आत्मा पदार्थ का संयोग है और पदार्थ आत्मा का रूपान्तर (विकार) है या यह कि शरीर आत्मा का अंश है निराधार है।

चूँकि भगवान् की सभी शक्तियाँ एकसाथ विद्यमान रहती हैं, अतएव मनुष्य को चाहिए कि भगवान् को समझे। यद्यपि वे हर वस्तु हैं, किन्तु वे हर वस्तु में उपस्थित नहीं रहते। ईश्वर की पूजा उनके मूल कृष्ण रूप में की जानी चाहिए। वे अपनी विभिन्न विस्तृत शक्तियों के अंश रूप में भी विद्यमान रह सकते हैं। जब हम मन्दिर में भगवान् के अर्चाविग्रह की पूजा करते हैं, तो यह अर्चाविग्रह पत्थर या लकड़ी लगता है। लेकिन चूँकि भगवान् का शरीर भौतिक नहीं होता, अतएव वे न तो पत्थर हैं न लकड़ी; फिर भी पत्थर तथा लकड़ी उनसे भिन्न नहीं होते। इस तरह पत्थर या लकड़ी की पूजा करने से हमें कोई फल नहीं प्राप्त होता, किन्तु जब पत्थर या लकड़ी को भगवान् के मूल रूप का प्रतिनिधित्व मान लिया जाता है, तो उस अर्चाविग्रह की पूजा करने से हमें वांछित फल प्राप्त होता है।

इसकी पुष्टि श्री चैतन्य महाप्रभु के अचिन्त्यभेदाभेद दर्शन द्वारा होती है, जो यह बताता है कि भगवान् अपने को अपनी शक्ति के रूप में भक्त की सेवा ग्रहण करने के लिए कहीं भी उपस्थित कर सकते हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥