श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 6

 
श्लोक
देवर्षिपितृभूतेभ्य आत्मने स्वजनाय च ।
अन्नं संविभजन्पश्येत्सर्वं तत्पुरुषात्मकम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
देव—देवता; ऋषि—साधु पुरुष; पितृ—पितरगण; भूतेभ्य:—सामान्य जीवों को; आत्मने—सम्बन्धियों; स्व-जनाय— पारिवारिक सदस्यों तथा मित्रों को; च—तथा; अन्नम्—भोजन (प्रसाद); संविभजन्—अर्पित करते हुए; पश्येत्—देखे; सर्वम्—सबों को; तत्—उस; पुरुष-आत्मकम्—भगवान् से सम्बन्धित ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि देवताओं, साधु पुरुषों, अपने पितरों, लोगों, अपने पारिवारिक सदस्यों, अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों को भगवान् के भक्तों के रूप में देखते हुए प्रसाद प्रदान करे।
 
तात्पर्य
 जैसाकि ऊपर कहा गया है, प्रत्येक जीव को भगवान् का अंश मानते हुए प्रसाद बाँटे। यहाँ तक कि गरीबों को भी प्रसाद वितरित करे। कलियुग में प्रत्येक वर्ष अन्नाभाव रहता है और इस तरह परोपकारी लोग गरीबों को खिलाने में दिल खोल कर खर्च करते हैं। इसके लिए उन्होंने दरिद्रनारायण सेवा शब्द ढूँढ़ निकाला है। यह मना है। हर एक को चाहिए कि भव्य प्रसाद का वितरण हर एक को भगवान् का अंग मानते हुए करे न कि वाक्जाल द्वारा गरीब मनुष्य को
नारायण बना दे। हर व्यक्ति परमेश्वर से सम्बन्धित है किन्तु उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर से सम्बन्धित होने से वह भगवान् बन गया है। ऐसा मायावाद दर्शन अत्यन्त घातक है, विशेष रूप से भक्त के लिए। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने मायावादी दार्शनिकों की संगति करने के लिए मना किया है। मायावादी भाष्य सुनिले हय सर्वनाश—यदि कोई मायावादी दर्शन से नाता जोड़ता है, तो उसके भक्तिमय जीवन का विनाश अवश्यम्भावी है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥