श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 62

 
श्लोक
भावाद्वैतं क्रियाद्वैतं द्रव्याद्वैतं तथात्मन: ।
वर्तयन्स्वानुभूत्येह त्रीन्स्वप्नान्धुनुते मुनि: ॥ ६२ ॥
 
शब्दार्थ
भाव-अद्वैतम्—देहात्म-बुद्धि में एकत्व; क्रिया-अद्वैतम्—कर्म में एकत्व; द्रव्य-अद्वैतम्—विभिन्न सामग्री में एकत्व; तथा— और; आत्मन:—आत्मा का; वर्तयन्—विचार करते हुए; स्व—अपना; अनुभूत्या—अनुभूति के अनुसार; इह—इस भौतिक जगत में; त्रीन्—तीन; स्वप्नान्—जीवित दशाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति); धुनुते—त्याग देता है; मुनि:—दार्शनिक या चिन्तक ।.
 
अनुवाद
 
 भाव, क्रिया तथा द्रव्य की अद्वैतता (एकत्व) पर विचार करने के बाद तथा आत्मा को समस्त कार्य-कारणों से पृथक् मानते हुए मुनि अपनी ही अनुभूति से जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं को त्याग देता है।
 
तात्पर्य
 अगले श्लोकों में भावाद्वैत, क्रियाद्वैत तथा द्रव्याद्वैत की व्याख्या दी गई है। किन्तु मनुष्य को भौतिक जगत में दार्शनिक जीवन
की सारी अद्वैतताएँ छोडऩी पड़ती हैं और सिद्धि प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक जगत के वास्तविक जीवन को प्राप्त करना होता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥