श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 64

 
श्लोक
यद् ब्रह्मणि परे साक्षात्सर्वकर्मसमर्पणम् ।
मनोवाक्तनुभि: पार्थ क्रियाद्वैतं तदुच्यते ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो; ब्रह्मणि—परब्रह्म में; परे—दिव्य; साक्षात्—प्रत्यक्ष; सर्व—समस्त; कर्म—कर्म; समर्पणम्—निवेदन, समर्पण; मन:—मन से; वाक्—वाणी से; तनुभि:—तथा शरीर से; पार्थ—हे महाराज युधिष्ठिर; क्रिया-अद्वैतम्—कर्म का एकत्व; तत् उच्यते—वह कहलाता है ।.
 
अनुवाद
 
 हे युधिष्ठिर (पार्थ), जब मनुष्य के मन, वाणी तथा शरीर द्वारा किये गये सारे कार्य साक्षात् भगवान् की सेवा में समर्पित किये जाते हैं, तो उसे क्रियाद्वैत नामक कर्मों का एकत्व प्राप्त होता है।
 
तात्पर्य
 कृष्णभावनामृत आन्दोलन लोगों को सिखाता है कि किस प्रकार प्रत्येक वस्तु को भगवान् की सेवा में समर्पित कर देने के स्तर तर पहुंँचा जाये। कृष्ण ने भगवद्गीता (९.२७) में कहा है—
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

“हे कुन्तीपुत्र! तुम जो भी करो, जो भी खाओ, जो भी आहुति दो तथा दान में दो तथा जो भी तपस्या करो वह सब मुझे भेंट रूप में समर्पित होनी चाहिए।” हम जो भी करते हैं, जो भी खाते हैं, जो भी सोचते तथा जो भी योजना बनाते हैं, यदि वह सब कृष्णभावनामृत आन्दोलन की प्रगति के लिए हो तो यह अद्वैत है। कृष्ण के नाम-कीर्तन तथा कृष्णभावनामृत के लिए कार्य करने में कोई अन्तर नहीं है। दिव्य पद पर ये एक हैं। किन्तु इस अद्वैत के विषय में हमें अपने गुरु से मार्ग-दर्शन प्राप्त करना चाहिए; हमें अपनी अद्वैतता नहीं बनानी चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥