श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 65

 
श्लोक
आत्मजायासुतादीनामन्येषां सर्वदेहिनाम् ।
यत्स्वार्थकामयोरैक्यं द्रव्याद्वैतं तदुच्यते ॥ ६५ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म—अपनी; जाया—पत्नी; सुत-आदीनाम्—तथा सन्तानों का; अन्येषाम्—अपने सम्बन्धियों का.; सर्व-देहिनाम्—समस्त जीवों का; यत्—जो भी; स्व-अर्थ-कामयो:—अपने चरम लक्ष्य तथा लाभ का; ऐक्यम्—एकत्व, अद्वैत; द्रव्य-अद्वैतम्— स्वार्थ का एकत्व; तत् उच्यते—कहा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब किसी मनुष्य का चरम लक्ष्य अपना तथा अपनी पत्नी का, अपनी सन्तानों का, अपने सम्बन्धियों का तथा अन्य समस्त देहधारियों का स्वार्थ एक ही हो तो यह द्रव्याद्वैत कहलाता है।
 
तात्पर्य
 सारे जीवों की वास्तविक रुचि—जीवन-लक्ष्य—भगवद्धाम जाने में होती है। यही अपनी, अपनी पत्नी की, अपने बच्चों की, अपने शिष्यों की तथा अपने मित्रों, सम्बन्धियों, देशवासियों तथा सारी मानवता की रुचि होती है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन व्यवस्था के ऐसे आदेश दे सकता है, जिससे प्रत्येक मनुष्य कृष्णभावनाभावित कार्यों में भाग ले सके और चरम लक्ष्य तक पहुँच सके जो स्वार्थगतिम् कहलाता है। प्रत्येक व्यक्ति की रुचि का लक्ष्य विष्णु है, लेकिन चूँकि लोग इसे नहीं जानते (न ते विदु: स्वार्थगतिम् हि विष्णुम् ), अतएव वे जीवन के अनेक कल्पित स्वार्थों
को पूरा करने की विविध योजनाएँ बनाते रहते हैं। कृष्णभावनामृत आन्दोलन हर एक को चरम स्वार्थ तक लाने का प्रयास कर रहा है। इस विधि का नाम भले ही भिन्न-भिन्न हो किन्तु यदि लक्ष्य एक ही हो तो लोगों को चाहिए कि जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए इसका पालन करें। दुर्भाग्यवश लोग विभिन्न स्वार्थों के विषय में सोचते हैं और अंधे नेता उन्हें दिग्भ्रमित कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण भौतिक सुख के लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु लोग पूर्ण सुख को न जानने के कारण विभिन्न भौतिक स्वार्थों की ओर मुड़ जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥