श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 66

 
श्लोक
यद् यस्य वानिषिद्धं स्याद्येन यत्र यतो नृप ।
स तेनेहेत कार्याणि नरो नान्यैरनापदि ॥ ६६ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो भी; यस्य—मनुष्य का; वा—या तो; अनिषिद्धम्—जिसकी मनाही न हो; स्यात्—ऐसा हो; येन—जिससे; यत्र— स्थान तथा समय में; यत:—जिससे; नृप—हे राजा; स:—ऐसा व्यक्ति; तेन—ऐसी विधि से; ईहेत—सम्पन्न करे; कार्याणि— नियत कार्यकलाप; नर:—मनुष्य; न—नहीं; अन्यै:—दूसरी विधियों से; अनापदि—संकट की अनुपस्थिति में ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा युधिष्ठिर, संकट न रहने पर सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन-स्तर के अनुसार नियत कार्यकलापों को ऐसी वस्तुओं, प्रयासों तथा विधियों से सम्पन्न करे तथा ऐसे स्थानों पर निवास करे जो उसके लिए निषिद्ध न हों । वह अन्य विधियों का उपयोग न करे।
 
तात्पर्य
 यह उपदेश सभी जीवन स्तरों वाले पुरुषों के लिए दिया गया है। सामान्य तया समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी तथा गृहस्थ में विभाजित है। हर एक को अपने पद के अनुसार कर्म करना चाहिए और भगवान् को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इससे जीवन सफल बनेगा। इसका उपदेश नैमिषारण्य में दिया गया था—
अत: पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागश:।

स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥

“हे द्विजश्रेष्ठ! अतएव यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य द्वारा अपने नियत कर्तव्यों (धर्म) का निर्वाह जाति तथा आश्रम के अनुसार करने से जो उच्चतम सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वह भगवान् हरि को प्रसन्न करना है।” (भागवत १.२.१३) प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि भगवान् को प्रसन्न करने के लिए अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों के अनुसार कर्म करे। तभी प्रत्येक व्यक्ति सुखी हो सकेगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥