श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 68

 
श्लोक
यथा हि यूयं नृपदेव दुस्त्यजा-
दापद्गणादुत्तरतात्मन: प्रभो: ।
यत्पादपङ्केरुहसेवया भवा-
नहारषीन्निर्जितदिग्गज: क्रतून् ॥ ६८ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; हि—निस्सन्देह; यूयम्—तुम सभी (पाण्डव); नृप-देव—हे राजाओं, मनुष्यों तथा देवताओं के स्वामी; दुस्त्यजात्—अजेय; आपत्—सङ्कटपूर्ण स्थितियाँ; गणात्—सबों से; उत्तरत—बच निकले; आत्मन:—अपना; प्रभो:—भगवान् का; यत्-पाद-पङ्केरुह—जिनके चरणकमल; सेवया—सेवा करने से; भवान्—आपने; अहारषीत्—सम्पन्न किया; निर्जित— हराकर; दिक्-गज:—हाथियों जैसे अत्यन्त शक्तिशाली शत्रु; क्रतून्—अनुष्ठान ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा युधिष्ठिर, तुम सभी पाण्डवों ने परमेश्वर की सेवा के कारण अनेक राजाओं तथा देवताओं द्वारा उत्पन्न बड़े से बड़े संकटों पर विजय प्राप्त कर ली। तुमने कृष्ण के चरणकमलों की सेवा करके हाथियों के समान बड़े-बड़े शत्रुओं को जीत लिया है और अपने यज्ञ के लिए सामग्री एकत्र की है। भगवत्कृपा से तुम भव-बन्धन से छूट जाओगे।
 
तात्पर्य
 महाराज युधिष्ठिर ने अपने को सामान्य गृहस्थ के रूप में प्रस्तुत करते हुए नारद मुनि से पूछा कि गृहमूढधी—गृहस्थ जीवन में फँस कर मूर्ख बना रहने वाले व्यक्ति—का उद्धार किस तरह हो सकता है। नारद मुनि ने यह कहते हुए महाराज युधिष्ठिर को प्रोत्साहित किया, “तुम सुरक्षित हो, क्योंकि तुम अपने सारे परिवार सहित कृष्ण के शुद्ध भक्त बन चुके हो।” कृष्ण की कृपा से पाण्डवों ने कुरुक्षेत्र का युद्ध जीत लिया था और बड़े-बड़े राजाओं तथा कभी कभी देवताओं के द्वारा भी उत्पन्न किये गये संकटों से अपने को बचा लिया था। इस प्रकार वे इसके जीते-जागते उदाहरण हैं कि कृष्ण की कृपा से किस प्रकार सुरक्षित रहा जा सकता है। हर व्यक्ति को पाण्डवों के उदाहरण का अनुकरण करना चाहिए जिन्होंने यह दिखलाया कि
किस प्रकार कृष्ण की कृपा से बचा जा सकता है। हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन का उद्देश्य यह शिक्षा देना है कि हर व्यक्ति किस तरह इस जगत में शान्तिपूर्वक रह सकता है और अन्त में भगवद्धाम वापस जा सकता है। भौतिक जगत में पद-पद पर विपत्तियाँ हैं (पदं पदं यद्विपदां न तेषाम् ) फिर भी यदि कोई नि:संकोच भाव से कृष्ण की शरण ग्रहण करके उसी में रहता जाता है, तो वह सरलता से अज्ञान-सागर को पार कर सकता है। समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत् पदं पुण्ययशो मुरारे:। भक्त के लिए यह विशाल अज्ञान-सागर गोखुर में लगे कीचड़ की तरह है। शुद्ध भक्त तरह-तरह से ऊपर उठने के प्रयास की चिन्ता न करता हुआ कृष्ण के दास के सुरक्षित पद पर बना रहता है और इस प्रकार उसका जीवन शाश्वत रूप से निस्सन्देह, सुरक्षित रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥