श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 70

 
श्लोक
रूपपेशलमाधुर्यसौगन्ध्यप्रियदर्शन: ।
स्त्रीणां प्रियतमो नित्यं मत्त: स्वपुरलम्पट: ॥ ७० ॥
 
शब्दार्थ
रूप—सौन्दर्य; पेशल—शरीर की बनावट; माधुर्य—आकर्षण; सौगन्ध्य—फूलों की मालाओं तथा चन्दन लेप से अलंकृत होने से अत्यन्त सुगन्धित; प्रिय-दर्शन:—देखने में अत्यन्त सुन्दर; स्त्रीणाम्—स्त्रियों का; प्रिय-तम:—सहज भाव से आकृष्ट; नित्यम्—प्रतिदिन; मत्त:—पागल की तरह गर्वित; स्व-पुर—अपने शहर में; लम्पट:—कामेच्छा के कारण स्त्रियों के प्रति अत्यधिक आसक्त ।.
 
अनुवाद
 
 मेरा मुखमण्डल सुन्दर था और मेरी शारीरिक रचना आकर्षक तथा सुहावनी थी। फूल के हारों से तथा चन्दन लेप से अलंकृत होने से मैं अपने नगर की स्त्रियों को अत्यन्त मोहक लगता था। इस तरह मैं मोहग्रस्त था और विषय-वासनाओं से सदैव पूर्ण रहता था।
 
तात्पर्य
 जब नारद गन्धर्व लोक के निवासी थे उस समय की उनकी सुन्दरता के वर्णन से ऐसा लगता है कि उस लोक का प्रत्येक व्यक्ति अत्यन्त सुन्दर तथा फूलों और चन्दन से अलंकृत रहता था। नारद मुनि का पहले का नाम उपबर्हण था। उपबर्हण अपने आपको अलंकृत करके स्त्रियों का ध्यान आकृष्ट करने में पटु था, फलत: जैसे अगले श्लोक में वर्णित है, वह एक रसिक हो गया। इस जीवन में रसिक होना दुर्भाग्यपूर्ण हैं क्योंकि स्त्रियों की ओर अत्यधिक आकृष्ट होने से वह शूद्र की संगति में जा गिरता है, जिसे स्त्रियों से बिना रोक-टोक मिलने का लाभ लिया जाता है। इस कलियुग में, जब सारे लोग मन्दा: सुमन्दमतय: हैं—शूद्र प्रवृत्ति के कारण अत्यन्त बुरे हैं—ऐसा स्वतंत्र
मिलना-जुलना प्रधान रहता है। उच्चतर जातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों में स्त्रियों के साथ पुरुषों का मुक्त मिलना-जुलना सम्भव नहीं है, किन्तु शूद्रों में इसकी छूट है। चूँकि इस कलियुग में कोई सांस्कृतिक शिक्षा नहीं दी जाती, अतएव हर व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से प्रशिक्षित नहीं है और इसीलिए वह शूद्र माना जाता है (अशुद्धा: शूद्रकल्पा हि ब्राह्मणा: कलिसम्भवा:)। जब सारे लोग शूद्र हो जाते हैं, तो यह बहुत बुरे हो जाते हैं। (मन्दा: सुमन्दमतय:) इस प्रकार वे अपनी जीवन-शैली बनाते हैं और इसका परिणाम यह निकलता है कि वे क्रमश: अभागे बन जाते हैं (मन्दभाग्या:) और विभिन्न परिस्थितियों द्वारा विचलित होते रहते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥