श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 71

 
श्लोक
एकदा देवसत्रे तु गन्धर्वाप्सरसां गणा: ।
उपहूता विश्वसृग्भिर्हरिगाथोपगायने ॥ ७१ ॥
 
शब्दार्थ
एकदा—एक बार; देव-सत्रे—देवताओं की सभा में; तु—निस्सन्देह; गन्धर्व—गन्धर्व लोक के वासी; अप्सरसाम्—तथा अप्सरलोक के वासियों के; गणा:—सभी; उपहूता:—बुलाये गये थे; विश्व-सृग्भि:—प्रजापति नामक बड़े-बड़े देवताओं द्वारा; हरि-गाथ-उपगायने—भगवान् की महिमा गायन के कीर्तन के समय ।.
 
अनुवाद
 
 एक बार देवताओं की सभा में भगवान् की महिमा के गायन के लिए एक संकीर्तन किया गया जिसमें गन्धर्वों तथा अप्सराओं को भाग लेने के लिए प्रजापतियों ने आमंत्रित किया।
 
तात्पर्य
 सङ्कीर्तन का अर्थ है भगवान् के पवित्र नाम का जाप करना। हरे कृष्ण आन्दोलन कोई नवीन आन्दोलन नहीं जैसाकि लोग कभी-कभी भ्रमवश सोचते हैं। हरे कृष्ण आन्दोलन ब्रह्माजी के जीवन के प्रत्येक युग में विद्यमान रहा है और पवित्र नाम का कीर्तन ब्रह्मलोक तथा चन्द्रलोक समेत सभी उच्च लोकों में किया जाता है, गन्धर्व लोक तथा अप्सरालोक की बात का तो कहना
ही क्या? अतएव आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व इस संसार में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा शुरू किया गया संकीर्तन आन्दोलन कोई नया आन्दोलन नहीं है। कभी-कभी हमारे दुर्भाग्यवश यह आन्दोलन रोक दिया जाता है, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके सेवकों ने समग्र विश्व के या यूं कहें, समग्र ब्रह्माण्ड के लाभ के लिए इस आन्दोलन को फिर से चालू किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥