श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 74

 
श्लोक
धर्मस्ते गृहमेधीयो वर्णित: पापनाशन: ।
गृहस्थो येन पदवीमञ्जसा न्यासिनामियात् ॥ ७४ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म:—वह धार्मिक विधि; ते—तुम्हें; गृह-मेधीय:—गृहस्थ जीवन में अनुरक्त रहकर; वर्णित:—(जैसा मैंने) बताया; पाप नाशन:—पापकर्मों का विनाश; गृहस्थ:—गृहस्थ जीवन बिताने वाला; येन—जिससे; पदवीम्—पद; अञ्जसा—सरलता से; न्यासिनाम्—संन्यासियों का; इयात्—प्राप्त कर सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन इतना शक्तिशाली है कि इससे गृहस्थ भी उसी चरम फल को सरलता से प्राप्त कर लेते हैं, जो संन्यासियों को प्राप्त होता है। हे महाराज युधिष्ठिर, मैंने तुम्हें धर्म की वह विधि बतला दी है।
 
तात्पर्य
 यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन की पुष्टि ही है। जो भी इस आन्दोलन में भाग लेता है, चाहे वह किसी भी जाती का हो उस सर्वोच्च फल को प्राप्त कर सकता है, जो एक पूर्ण संन्यासी को प्राप्त होता है—अर्थात् ब्रह्मज्ञान। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि वह भक्ति में प्रगति कर सकता है। महाराज युधिष्ठिर ने सोचा कि वे गृहस्थ हैं, अतएव उन्हें अपना
मोक्ष प्राप्त करने की कोई आशा नहीं थी। इसीलिए उन्होंने नारद मुनि से पूछा था कि वे भवबन्धन से किस प्रकार छूट सके। लेकिन नारद मुनि ने अपना निजी उदाहरण देते हुए यह बतलाया कि भक्तों की संगति करने तथा हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करने से कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में बिना किसी संदेह के चरम सिद्धि (परम पद) प्राप्त कर सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥