श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 75

 
श्लोक
यूयं नृलोके बत भूरिभागा
लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति ।
येषां गृहानावसतीति साक्षाद्
गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम् ॥ ७५ ॥
 
शब्दार्थ
यूयम्—तुम सभी पाण्डव; नृ-लोके—इस जगत में; बत—निस्सन्देह; भूरि-भागा:—अत्यन्त भाग्यशाली; लोकम्—ब्रह्माण्ड के सारे लोक; पुनाना:—शुद्ध कर सकते हो; मुनय:—बड़े-बड़े साधु पुरुष; अभियन्ति—(सामान्य पुरुष की भाँति) देखने आते हैं; येषाम्—जिसके; गृहान्—पाण्डवों के घर को; आवसति—रहता है; इति—इस प्रकार; साक्षात्—प्रत्यक्ष; गूढम्—अत्यन्त गोपनीय; परम्—दिव्य; ब्रह्म—परब्रह्म, कृष्ण; मनुष्य-लिङ्गम्—मानो सामान्य व्यक्ति हों ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाराज युधिष्ठिर, तुम सभी पाण्डव इस संसार में इतने भाग्यशाली हो कि ब्रह्माण्ड के समस्त लोकों को पवित्र करने वाले अनेकानेक सन्तजन तुम्हारे घर में सामान्य दर्शक के रूप में आते हैं। साथ ही, भगवान् कृष्ण तुम्हारे घर में गोपनीय ढंग से तुम्हारे भाई के समान रह रहे हैं।
 
तात्पर्य
 यह वैष्णव की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला कथन है। मानव समाज में ब्राह्मण ही सर्वाधिक सम्मानित व्यक्ति है। ब्राह्मण वह है, जो निर्विशेष ब्रह्म को समझ सके लेकिन शायद ही कोई उन भगवान् को समझ पाता हो, जिन्हें भगवद्गीता में अर्जुन द्वारा परं ब्रह्म कहा गया है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त ब्राह्मण भले ही अत्यन्त
भाग्यशाली माना जाये, किन्तु पाण्डव तो इतने भाग्यशाली थे कि परब्रह्म भगवान् उनके घर में सामान्य व्यक्ति की तरह रहते थे। भूरिभागा: शब्द बताता है कि पाण्डवगण ब्रह्मचारीयों तथा ब्राह्मणों से भी उच्चतर पद पर थे। अगले श्लोक में नारद मुनि पाण्डवों के पद की महिमा का बारम्बार वर्णन करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥