श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 76

 
श्लोक
स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्य
कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूति: ।
प्रिय: सुहृद् व: खलु मातुलेय
आत्मार्हणीयो विधिकृद्गुरुश्च ॥ ७६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—भगवान्; वा—या तो; अयम्—कृष्ण; ब्रह्म—परब्रह्म; महत्-विमृग्य—बड़े-बड़े सन्त पुरुष (कृष्ण भक्त) द्वारा खोजे जाने वाले; कैवल्य-निर्वाण-सुख—मोक्ष तथा दिव्य आनन्द के; अनुभूति:—साक्षात्कार के लिए; प्रिय:—प्रिय; सुहृत्—शुभ चिन्तक; व:—तुम सारे पाण्डवों; खलु—के रूप में प्रसिद्ध; मातुलेय:—मामा का पुत्र, ममेरा भाई; आत्मा—हृदय तथा आत्मा; अर्हणीय:—अत्यन्त पूजनीय; विधि-कृत्—निर्देश देते; गुरु:—तुम्हारा गुरु; च—और ।.
 
अनुवाद
 
 यह कितना आश्चर्यजनक है कि वे परब्रह्म कृष्ण जिन्हें बड़े-बड़े मुनि अपनी मुक्ति तथा शाश्वत आनन्द प्राप्ति के लिए ढूँढते रहते हैं तुम्हारे श्रेष्ठ शुभचिन्तक, मित्र, ममेरे भाई, आत्मा, पूज्य निर्देशक तथा गुरु की भाँति कार्य कर रहे हैं।
 
तात्पर्य
 कृष्ण ऐसे किसी भी व्यक्ति के निर्देशक तथा गुरु बन सकते हैं, जो उनकी कृपा पाने का इच्छुक रहता है। भगवान् गुरु को इसलिए भेजते हैं कि वह भक्त को प्रशिक्षित करे और जब भक्त प्रगत हो जाये तो भगवान् उसके हृदय में रहकर गुरु की भाँति कार्य करें।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो लोग निरन्तर मेरी भक्ति करते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं उन्हें मैं बुद्धि देता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।” जब तक कोई भगवान् के प्रतिनिधि गुरु द्वारा पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं हो जाता तब तक कृष्ण किसी के साक्षात् गुरु नहीं बनते। अतएव जैसाकि हम पहले कह चुके हैं भगवान् के प्रतिनिधि गुरु को कभी भी सामान्य मनुष्य नहीं समझना चाहिए। प्रतिनिधि गुरु कभी अपने शिष्य को असत्य ज्ञान नहीं देता, वह केवल पूर्ण ज्ञान प्रदान करता है। इस तरह वह कृष्ण का प्रतिनिधि होता है। कृष्ण भीतर तथा बाहर से गुरु की भाँति सहायता करते हैं। बाहर से वे प्रतिनिधि बनकर और भीतर से साक्षात् रूप में शुद्ध भक्त से बातें करते हैं और उसे उपदेश देते हैं जिससे वह भगवद्धाम वापस जा सकता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥