श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  »  श्लोक 9

 
श्लोक
एके कर्ममयान् यज्ञान् ज्ञानिनो यज्ञवित्तमा: ।
आत्मसंयमनेऽनीहा जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
एके—कोई-कोई, कुछ; कर्म-मयान्—कर्मफल से युक्त (यथा पशु-वध); यज्ञान्—यज्ञ; ज्ञानिन:—ज्ञान में अग्रसर लोग; यज्ञ-वित्-तमा:—यज्ञ के उद्देश्य को भलीभाँति जानने वाला; आत्म-संयमने—आत्म संयम द्वारा; अनीहा:—निष्काम; जुह्वति— यज्ञ करता है; ज्ञान-दीपिते—पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित ।.
 
अनुवाद
 
 आध्यात्मिक ज्ञान से जागृत होने से यज्ञ के विषय में बुद्धिमान व्यक्ति, धार्मिक नियमों के वास्तविक ज्ञाता तथा निष्काम व्यक्ति अपने को आध्यात्मिक ज्ञान की अथवा परम सत्य विषयक ज्ञान की अग्नि में संयमित बनाते हैं। वे कर्मकाण्डीय अनुष्ठान विधि को त्याग सकते हैं।
 
तात्पर्य
 लोग स्वर्ग जाने के लिए कर्मकाण्ड अनुष्ठानों में अधिक रुचि रखते हैं किन्तु जब आध्यात्मिक ज्ञान जागृत हो जाता है, तो वे ऊपर उठने के प्रति उदासीन होकर जीवन-लक्ष्य खोजने के लिए ज्ञान यज्ञ में लग जाते हैं। जीवन का लक्ष्य
जन्म तथा मृत्यु के दुखों को पूरी तरह रोक कर भगवद्धाम को वापस जाना है। जब मनुष्य इस उद्देश्य के लिए ज्ञान का अनुशीलन करता है, तो वह कर्म यज्ञ में लगे हुए लोगों की तुलना में उच्चतर पद पर स्थित समझा जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥