श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 15: सुसंस्कृत मनुष्यों के लिए उपदेश  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 पन्द्रहवें अध्याय का सारांश इस प्रकार है। पिछले अध्याय में श्रीनारद मुनि ने समाज में ब्राह्मण की महत्ता सिद्ध की। इस अध्याय में अब वे ब्राह्मण की विभिन्न कोटियों में अन्तर दिखलाएँगे। ब्राह्मणों में कुछ तो गृहस्थ होते हैं और अधिकतर सकाम कर्मों में या सामाजिक दशाओं के सुधार में आसक्त रहते हैं। किन्तु इनसे भी ऊपर वे ब्राह्मण हैं, जो तपस्या के प्रति अधिक आकृष्ट रहते हैं और पारिवारिक जीवन से विरक्त हो जाते हैं। ये वानप्रस्थ कहलाते हैं। अन्य ब्राह्मण वेदाध्ययन करने तथा अन्यों को वेदों का तात्पर्य बताने में अधिक रुचि लेते हैं। ऐसे ब्राह्मण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। कुछ अन्य ब्राह्मण विभिन्न प्रकार के योगों में विशेष रूप से भक्तियोग तथा ज्ञानयोग में रुचि लेते हैं। ऐसे ब्राह्मण अधिकांशतया संन्यासी होते हैं।
जहाँ तक गृहस्थों का सम्बन्ध है वे विभिन्न प्रकार के शास्त्रीय कृत्यों में, विशेषतया अपने पितरों को आहुति देने तथा अन्य ब्राह्मणों को ऐसे यज्ञों में लगी साज-सामग्री दान रुप में लगे रहते हैं। ऐसा दान सामान्यतया विरक्त जीवन बिताने वाले ब्राह्मण-संन्यासियों को दिया जाता है। यदि ऐसा संन्यासी नहीं मिल पाता तो सकाम कर्मों में रत ब्राह्मण-गृहस्थों को यह दान दिया जाता है।

लोगों को चाहिए कि अपने पितरों को आहुति देने के लिए श्राद्ध उत्सव में विशद प्रबन्ध न करें। श्राद्ध उत्सव मनाने की सर्वोत्तम विधि अपने सारे पितरों तथा सम्बन्धियों को भागवत-प्रसाद का वितरण करना है। यह सर्वोत्तम श्राद्ध कर्म है। श्राद्ध कर्म में मांस परोसने या मांस खाने की आवश्यकता नहीं है। व्यर्थ ही पशुओं का वध करने से बचना चाहिए। समाज में निम्न कोटि के लोग पशुओं का वध करके यज्ञ करना चाहते हैं किन्तु जो ज्ञान में बढ़े-चढ़े हैं उन्हें ऐसी अनावश्यक हिंसा से बचना चाहिए।

ब्राह्मणों को चाहिए कि वे भगवान् विष्णु के पूजन को नियमित करें। जो धर्म-ज्ञान में बढ़े-चढ़े हैं उन्हें पाँच प्रकार के अधर्मों से बचना चाहिए। ये हैं—विधर्म, परधर्म, धर्माभास, उपधर्म तथा छल धर्म। मनुष्य को अपनी स्वाभाविक स्थिति के अनुकूल धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सारे लोग एक ही प्रकार के धर्म में दृढ़ बने रहें। सामान्य नियम यह है कि गरीब व्यक्ति व्यर्थ ही आर्थिक विकास के लिए प्रयास न करे। जो ऐसे प्रयासों से बचता है किन्तु भक्ति में लगता है, वह अत्यन्त पुण्यात्मा होता है।

जो अपने मन से तुष्ट नहीं है उसका पतन निश्चित है। मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, भय, शोक, मोह, त्रास, भौतिक विषयों पर व्यर्थ बातें, हिंसा, भौतिक संसार के चार क्लेश तथा तीनों भौतिक गुणों को जीतना चाहिए। यही मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है। जिसे श्रीकृष्ण के समरूप अपने गुरु पर श्रद्धा नहीं है, वह शास्त्रों के अध्ययन से कुछ भी लाभ नहीं पा सकता। मनुष्य को गुरु को कभी भी सामान्य पुरुष नहीं समझना चाहिए, भले ही गुरु के परिवार वाले उसे ऐसा मानते हों। ध्यान तथा तपस्या की अन्य विधियाँ तभी लाभप्रद हैं जब वे कृष्णभावनामृत की ओर अग्रसर होने में सहायक हों, अन्यथा वे समय तथा श्रम का अपव्यय हैं। जो भक्त नहीं हैं उन्हें ऐसा ध्यान तथा तपस्या नीचे गिराने वाले हैं।

प्रत्येक गृहस्थ को अत्यन्त सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि गृहस्थ भले ही इन्द्रियों को वश में करने का प्रयास क्यों न करे वह अपने सम्बन्धियों की संगति का शिकार होकर में नीचे गिर जाता है। इस तरह गृहस्थ को वानप्रस्थ या संन्यासी बनना चाहिए, अर्थात् एकान्त में रहना चाहिए और द्वार-द्वार भिक्षा माँगने से जो भोजन मिल जाए उसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए। उसे ओङ्कार मंत्र या हरे कृष्ण मंत्र का जप करना चाहिए। इस प्रकार उसे अपने भीतर दिव्य आनन्द की अनुभूति हो सकेगी। किन्तु यदि कोई संन्यास लेने के बाद गृहस्थ जीवन में लौट आता है, तो वह वान्ताशी अर्थात् “अपनी ही कै को खाने वाला” कहलाता है। ऐसा व्यक्ति निर्लज्ज होता है। गृहस्थ को न तो संस्कार अनुष्ठानों को छोडऩा चाहिए और न संन्यासी को समाज में रहना चाहिए। यदि संन्यासी इन्द्रियों द्वारा विचलित होता है, तो वह रजो तथा तमो गुणों के वश में रहने वाला ठग है। जब कोई परोपकारी कार्य करके सतोगुणी भूमिका निभाता है, तो ऐसे कार्य भक्ति के मार्ग में अवरोधक बन जाते हैं।

भक्ति में प्रगति करने की सर्वोत्तम विधि गुरु के आदेशों का पालन करना है, क्योंकि गुरु के निर्देश से ही इन्द्रियों को जीता जा सकता है। जब तक कोई पूर्णत: कृष्णभावनाभावित न हो तब तक नीचे गिरने की सम्भावना बनी रहती है। निस्सन्देह, कर्मकाण्ड तथा अन्य सकाम कर्म करते हुए हर क्षण अनेक खतरे बने रहते हैं। सकाम कर्मों को बारह भागों में विभाजित किया गया है। सकाम कर्म करने कारण जिन्हें धर्म पथ कहा जाता है मनुष्य को जन्म-मृत्यु का चक्र स्वीकार करना पड़ता है, किन्तु जब कोई मोक्ष मार्ग ग्रहण करता है, जिसे भगवद्गीता में अर्चना मार्ग कहा गया है, तो मनुष्य को जन्म- मृत्यु के चक्र से छुटकारा मिल जाता है। वेदों में इन दोनों मार्गों को पितृ यज्ञ तथा देव यज्ञ कहा गया है। जो लोग इन दोनों मार्गों का अनुसरण करते हैं, वे भौतिक शरीर में रहकर भी कभी मोहित नहीं होते। एकेश्वरवादी दार्शनिक, जो अपनी इन्द्रियों को धीर-धीरे वश में कर पाता है, समझता है कि सारे आश्रमों का उद्देश्य मोक्ष है। मनुष्य को शास्त्रों के अनुसार जीवन-यापन करना चाहिए।

यदि वैदिक कर्मकाण्डी व्यक्ति भक्त बन जाता है भले ही वह गृहस्थ क्यों न हों तो उसे कृष्ण की अहैतुकी कृपा प्राप्त होती है। भक्त का उद्देश्य भगवद्धाम को वापस जाना है। ऐसा भक्त कर्मकाण्ड न करने पर भी भगवत्कृपा से आध्यात्मिक चेतना में प्रगति करता है। कोई भी व्यक्ति वास्तव में भक्तों की कृपा से आध्यात्मिक चेतना में सफल हो सकता है या भक्तों से के प्रति अनादर दिखा कर वह आध्यात्मिक चेतना से नीचे गिर सकता है। इस प्रसंग में नारद मुनि ने अपनी कथा कह सुनाई कि किस प्रकार वे गन्धर्वलोक से नीचे आकर शूद्रकुल में उत्पन्न हुए और किस प्रकार उन्नत ब्राह्मणों की सेवा करके ब्रह्मा के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए और किस तरह उन्होंने अपना दिव्य पद पुन: प्राप्त किया। इन कथाओं को सुनाने के बाद नारद मुनि ने पांडवों द्वारा भगवान् से प्राप्त कृपा की पाण्डवों की प्रशंसा की नारद मुनि से सुनने के बाद महाराज युधिष्ठिर कृष्ण के प्रेम में विह्वल हो गये और नारद भी अपने धाम के लिए रवाना हो गये। इस प्रकार शुकदेव गोस्वामी द्वारा दक्ष की कन्याओं की विभिन्न सन्तानों का वर्णन किये जाने के बाद श्रीमद्भागवत का सप्तम स्कंध समाप्त होता है।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥