श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 10

 
श्लोक
तावद्यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।
सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानिन: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तावत्—जब तक (मैं विष्णु के मारने में व्यस्त हूँ); यात—जाओ; भुवम्—पृथ्वी लोक में; यूयम्—तुम सब; ब्रह्म-क्षत्र— ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का; समेधिताम्—कर्मों (ब्राह्मण संस्कृति तथा वैदिक शासन) द्वारा सम्पन्न बने हुए; सूदयध्वम्—विनष्ट कर दो; तप:—तपस्या करने वालों को; यज्ञ—यज्ञ; स्वाध्याय—वैदिक ज्ञान का अध्ययन; व्रत—अनुष्ठान सम्बन्धी प्रतिज्ञाएँ; दानिन:—तथा दान देने वालों का ।.
 
अनुवाद
 
 जब तक मैं भगवान् विष्णु के मारने के कार्य में लगा हूँ, तब तक तुम लोग पृथ्वी लोक में जाओ जो ब्राह्मण संस्कृति तथा क्षत्रिय शासन के कारण फल-फूल रहा है। ये लोग तपस्या, यज्ञ, वैदिक अध्ययन, आनुष्ठानिक व्रत तथा दान में लगे रहते हैं। ऐसे सारे लोगों को जाकर विनष्ट कर दो।
 
तात्पर्य
 हिरण्यकशिपु का मुख्य उद्देश्य देवताओं को विचलित करना था। उसने सर्वप्रथम भगवान् विष्णु को मार डालने की योजना बनाई जिससे विष्णु की मृत्यु होने पर सारे देवता स्वत: निर्बल होकर मर जाएंगे। उसकी दूसरी योजना पृथ्वी के वासियों को सताने की थी। पृथ्वीवासियों तथा अन्य लोकों की शान्ति तथा समृद्धि ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों द्वारा स्थिर रखी जाती थी। भगवद्गीता (४.१३) में भगवान् कहते हैं—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:—प्रकृति के तीन गुणों तथा उनके नियत कर्म के अनुसार मानव समाज के चार वर्णों की सृष्टि मेरे द्वारा की गई है। सभी लोकों में भिन्न भिन्न प्रकार के वासी रहते हैं, लेकिन यहाँ पर मनुष्यों द्वारा निवसित पृथ्वी लोक के प्रसंग में वे संस्तुत करते हैं कि समाज चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—में विभाजित किया जाए। इस पृथ्वी पर भगवान् कृष्ण के अवतार के पूर्व ऐसा जाना जाता है कि यह पृथ्वी ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों द्वारा व्यवस्थित होती थी। ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह शम: (शान्ति), दम: (आत्मसंयम), तितिक्षा (सहिष्णुता), सत्यम् (सच्चाई), शौचम् (स्वच्छता) तथा आर्जवम् (सरलता) का संवर्धन करे और तब क्षत्रिय राजाओं को सलाह दे कि देश या लोक पर किस तरह शासन किया जाये। ब्राह्मणों के उपदेशों का पालन करते हुए क्षत्रियों को चाहिए कि वे जनता को तपस्या, यज्ञ, स्वाध्याय तथा वैदिक अनुष्ठानों में दृढ़ बनने के लिए प्रवृत्त करें। उन्हें ब्राह्मणों, संन्यासियों तथा मन्दिरों को दान देने की भी व्यवस्था करनी चाहिए। ब्राह्मण संस्कृति का यह दैवी विधान है।
लोगों की प्रवृत्ति यज्ञ सम्पन्न करने की ओर इसलिए होती है, क्योंकि यदि यज्ञ नहीं किये जाएं तो अपर्याप्त वर्षा होगी (यज्ञाद् भवति पर्जन्य:) जिससे कृषिकर्म में बाधा उपस्थित होगी (पर्जन्याद् अन्नसम्भव:) अतएव ब्राह्मण संस्कृति का सूत्रपात करके क्षत्रिय सरकार को चाहिए कि लोगों को यज्ञ करने, वेदों को पढऩे तथा दान देने के प्रति प्रवृत्त करें। इस प्रकार लोगों की आवश्यकताएँ सरलता से पूर्ण हो सकेंगी और समाज में उपद्रव नहीं होगा। इस सम्बन्ध में भगवान् कृष्ण भगवद्गीता (३.१२) में कहते हैं—

इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स: ॥

“सारे देवता जीवन की विविध आवश्यकताओं का भार सँभालने के कारण यज्ञ सम्पन्न होने पर तुष्ट होकर मनुष्य की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। किन्तु जो व्यक्ति इन उपहारों को देवताओं को अर्पित किये बिना भोग करता है, वह निश्चय ही चोर है।”

देवतागण वैध इच्छापूर्ति अभिकर्ता हैं, जो विष्णु के प्रतिनिधि रूप में कार्य करते हैं, अतएव नियत यज्ञ सम्पन्न करके उन्हें प्रसन्न किया जाना चाहिए। वेदों में विभिन्न देवताओं के लिए भिन्न-भिन्न यज्ञ बताये गये हैं, किन्तु वे सारे यज्ञ अन्तत: भगवान् को ही समर्पित होते हैं। जो भगवान् को नहीं समझ सकता उसके लिए संस्तुति की जाती है कि वह देवताओं के लिए यज्ञ करे। वेदों में सम्बद्ध व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न भौतिक गुणों के अनुसार विभिन्न यज्ञों की संस्तुति की गई है। विभिन्न देवताओं की पूजा का आधार भी गुणों के अनुसार है। उदाहरणार्थ, मांसाहारियों को प्रकृति की बीभत्स स्वरूपा देवी काली की पूजा की संस्तुति की जाती है। इस देवी के समक्ष पशुओं की बलि दी जाती है। किन्तु सतोगुणियों के लिए विष्णु-पूजा की संस्तुत की जाती है। अन्तत: सारे यज्ञ क्रमश: दिव्य पद तक उठने के निमित्त किये जाते हैं। सामान्य व्यक्तियों के लिए कम से कम पाँच यज्ञ आवश्यक हैं जिन्हें पञ्चमहायज्ञ कहा जाता है।

किन्तु मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि मानव समाज की सारी आवश्यकताएँ भगवान् के अभिकर्ता देवताओं द्वारा पूरी की जाती हैं। कोई कुछ बना नहीं सकता। उदाहरणार्थ, मानव समाज के समस्त खाद्य पदार्थों के विषय में विचार करें। इनमें अन्न, फल, तरकारियाँ, दूध तथा चीनी सम्मिलित हैं, जो शाकाहारियों के लिए हैं। इनमें मांसाहारियों के लिए भी खाद्य पदार्थ होते हैं, यथा मांस, किन्तु इनमें से किसी का भी निर्माण मनुष्य द्वारा नहीं हो सकता। पुन: दूसरा उदाहरण उष्मा, प्रकाश, जल तथा वायु का लें जो जीवन के लिए आवश्यक हैं और इनमें से किसी का भी निर्माण मानव समाज द्वारा नहीं हो सकता। परमेश्वर के बिना न तो प्रचुर सूर्यप्रकाश हो सकता है, न चाँदनी, न वर्षा, न मन्द समीर जिनके अभाव में कोई जीवित नहीं रह सकता। स्पष्ट है कि हमारे जीवन भगवान् द्वारा प्रदत्त वस्तुओं पर आश्रित है। यहाँ तक कि अपने निर्माणकार्यों के लिए भी हमें अनेक कच्चे मालों की आवश्यकता होती है—यथा धातुएँ, गन्धक, पारा, मैंगनीज इत्यादि और ये सब भगवान् के अभिकर्ताओं द्वारा इस उद्देश्य से प्रदान की जाती हैं कि हम इनका उचित उपयोग करके अपने को स्वस्थ रखकर आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकें जो हमारे जीवन का चरम लक्ष्य अर्थात् संसार में जीवन-संघर्ष से मोक्ष है। यह जीवन-लक्ष्य यज्ञों को सम्पन्न करके प्राप्त किया जाता है। यदि हम मनुष्य जीवन के प्रयोजन को भूल जाते हैं और मात्र इन्द्रियतृप्ति के लिए भगवान् के अभिकर्ताओं से आपूर्ति ग्रहण करते जाते हैं और संसार में अधिकाधिक फँसते जाते हैं, जो सृष्टि का उद्देश्य नहीं है, तो निश्चय ही हम चोर बन जाते हैं और हमें प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डित होना पड़ता है। चोरों का समाज कभी सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि उनका कोई जीवन-लक्ष्य नहीं होता। निपट भौतिकतावादी चोरों का कोई जीवन लक्ष्य नहीं होता। वे इन्द्रियतृप्ति द्वारा प्रेरित होते हैं, उन्हें यज्ञों को सम्पन्न करने का कोई ज्ञान भी नहीं होता। किन्तु भगवान् चैतन्य ने यज्ञ की सरलतम विधि का सूत्रपात किया, जो सङ्कीर्तन यज्ञ है और जिसे विश्व का कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो कृष्णभावनामृत के सिद्धान्तों को स्वीकार करता है, सम्पन्न कर सकता है।

हिरण्यकशिपु ने पृथ्वी के निवासियों को मार डालने की योजना बनाई थी जिससे यज्ञ बन्द हो जाँय और सारे देवता विचलित हो कर स्वत: मर जाएं। जब परमेश्वर भगवान् विष्णु का स्वत: वध हो जाएगी। ये हिरण्यकशिपु की आसुरी योजनाएँ थीं और वह ऐसे कार्यों में दक्ष था।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥