श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 13

 
श्लोक
इति ते भर्तृनिर्देशमादाय शिरसाद‍ृता: ।
तथा प्रजानां कदनं विदधु: कदनप्रिया: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; ते—वे; भर्तृ—स्वामी की; निर्देशम्—आज्ञा; आदाय—प्राप्त कर; शिरसा—सिर के बल; आदृता:—आदर करते हुए; तथा—और; प्रजानाम्—सारे नागरिकों का; कदनम्—दण्ड; विदधु:—दिया; कदन-प्रिया:—अन्यों को दण्ड देने में पटु ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह जघन्य कर्मों के इच्छुक असुरों ने हिरण्यकशिपु की आज्ञा को अत्यन्त आदरपूर्वक लिया और उसे नमस्कार किया। उसके निर्देशानुसार वे सारे जीवों के विरुद्ध ईर्ष्यापूर्ण कार्यकलाप में जुट गये।
 
तात्पर्य
 जैसाकि यहाँ पर बताया गया है आसुरी सिद्धान्तों के अनुयायी सामान्य जनों के प्रति नितान्त ईर्ष्या से भरे रहते हैं। आजकल की वैज्ञानिक प्रगति इस ईर्ष्या का जीता-जागता उदाहरण है। नाभिकीय ऊर्जा की खोज जनता के लिए विपत्तिजनक रही है, क्योंकि संसार भर में असुरगण नाभिकीय हथियार बना रहे हैं। इस प्रसंग में कदनप्रिया: शब्द अत्यन्त सार्थक है।
असुरगण जो वैदिक संस्कृति को विनष्ट कर देना चाहते हैं, वे निर्बल नागरिकों से अत्यधिक ईर्ष्या करते हैं और ऐसा कार्य करते हैं कि उनकी खोजें अन्ततोगत्वा हर एक के लिए अकल्याणकर सिद्ध हों (जगतोऽहिता:)। भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में यह भलीभाँति बताया गया है कि असुरगण सामान्यजनों के विनाश हेतु किस प्रकार पापकर्मों में रत रहते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥