श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 16

 
श्लोक
एवं विप्रकृते लोके दैत्येन्द्रानुचरैर्मुहु: ।
दिवं देवा: परित्यज्य भुवि चेरुरलक्षिता: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; विप्रकृते—सताये जाकर; लोके—जब सारे लोग; दैत्य-इन्द्र-अनुचरै:—दैत्यराज हिरण्यकशिपु के अनुयायियों द्वारा; मुहु:—पुन: पुन:; दिवम्—स्वर्ग लोक को; देवा:—देवतागण; परित्यज्य—त्याग कर; भुवि—पृथ्वी लोक पर; चेरु:—घूमने लगे (उपद्रव का विस्तार देखने के लिये); अलक्षिता:—असुरों से छिप कर ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार हिरण्यकशिपु के अनुयायियों द्वारा बारम्बार अप्राकृतिक घटनाओं के रूप में सताये जाने पर सभी लोगों ने बाध्य होकर वैदिक संस्कृति की सारी गतिविधियाँ बन्द कर दीं। देवतागण भी यज्ञों का फल न पाने के कारण विचलित हो उठे। उन्होंने स्वर्गलोक के अपने- अपने आवास त्याग दिये और असुरों से अलक्षित होकर विनाश का अवलोकन करने के लिए वे पृथ्वीलोक में इधर-उधर विचरण करने लगे।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, यज्ञ सम्पन्न करने से मनुष्यों तथा देवताओं को अन्योन्याश्रित सौभाग्य प्राप्त होता है। जब असुरों के उत्पातों से यज्ञ होने बन्द हो गये तो देवतागण सहज ही यज्ञ के
फलों से वंचित रह गये और उन्हें अपने-अपने कर्तव्य करने में बाधा पडऩे लगी। अतएव वे पृथ्वी लोक पर यह देखने के लिए कि लोग किस प्रकार विचलित हुए और यह विचार करने के लिए कि क्या करना चाहिये, उतर आये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥