श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 22

 
श्लोक
नित्य आत्माव्यय: शुद्ध: सर्वग: सर्ववित्पर: ।
धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन्गुणान् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
नित्य:—शाश्वत; आत्मा—आत्मा; अव्यय:—न चुकने वाला; शुद्ध:—भौतिक कल्मष से रहित; सर्व-ग:—भौतिक या आध्यात्मिक जगतों में कहीं भी जाने के योग्य; सर्व-वित्—ज्ञान से पूर्ण; पर:—भौतिक दशाओं से परे; धत्ते—स्वीकार करता है; असौ—वह आत्मा या जीव; आत्मन:—अपना; लिङ्गम्—शरीर; मायया—भौतिक शक्ति के द्वारा; विसृजन्—उत्पन्न करते हुए; गुणान्—विविध भौतिक गुणों को ।.
 
अनुवाद
 
 आत्मा या जीव की मृत्यु नहीं होती, क्योंकि वह नित्य तथा अव्यय है। भौतिक कल्मष से मुक्त होने के कारण वह भौतिक या आध्यात्मिक जगतों में कहीं भी जा सकता है। वह भौतिक शरीर से पूरी तरह अवगत होते हुए भी उससे सर्वथा भिन्न है, किन्तु अपनी किंचित स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण उसे भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर धारण करने होते हैं और इस तरह उसे तथाकथित भौतिक सुख तथा दुख सहने होते हैं। अतएव किसी भी मनुष्य को शरीर में से आत्मा के निकलने पर शोक नहीं करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 हिरण्यकशिपु ने अत्यन्त बुद्धिमानी से आत्मा की स्थिति का वर्णन किया है। आत्मा कभी भी शरीर नहीं होता, अपितु वह सदैव शरीर से पूर्णतया भिन्न होता है। नित्य तथा अव्यय होने के कारण आत्मा की मृत्यु नहीं होती, किन्तु जब वही शुद्ध आत्मा मुक्तभाव से भौतिक जगत का भोग करना चाहता है, तो उसे प्रकृति के प्रतिबन्धों के अन्तर्गत रख दिया जाता है, जिसके कारण उसे किसी न किसी प्रकार शरीर धारण करना पड़ता है और उसके सुखों एवं दुखों को भोगना होता है। इसका वर्णन कृष्ण द्वारा भगवद्गीता (१३.२२) में भी हुआ है। कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्-योनिजन्मसु—
जीव विभिन्न परिवारों में या योनियों में उत्पन्न होता है, क्योंकि वह प्रकृति के गुणों द्वारा दूषित रहता है। प्रकृति द्वारा बद्ध होने पर जीव को एक प्रकार का शरीर धारण करना होता है, जो परमेश्वर के आदेशानुसार प्रकृति द्वारा प्रदत्त होता है।

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

“हे अर्जुन! परमेश्वर प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं और ये उन सारे जीवों के विचरण का निर्देश करते रहते हैं, जो भौतिक शक्ति से निर्मित यंत्र पर आरूढ होते हैं।” (भगवद्गीता १८.६१) यह शरीर एक यंत्र के तुल्य है और जीव को उसके कर्म के अनुसार प्रकृति के वशीभूत होकर इधर-उधर विचरण करने के लिये विशेष प्रकार का यंत्र प्रदान किया जाता है। यह तब तक चलता रहता है जब तक वह परमेश्वर की शरण में नहीं जाता (मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते )। बिना शरण में गये बद्धजीव प्रकृति की व्यवस्था से एक जीवन से दूसरे जीवन में ले जाया जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥