श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 40

 
श्लोक
पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं
गृहे स्थितं तद्विहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि तदीक्षितो वने
गृहेऽभिगुप्तोऽस्य हतो न जीवति ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
पथि—रास्ते में; च्युतम्—गिरा हुआ, अधिकार से वंचित; तिष्ठति—बना रहता है; दिष्ट-रक्षितम्—भाग्य द्वारा रक्षित; गृहे—घर में; स्थितम्—यद्यपि स्थित; तत्-विहतम्—परमेश्वर की इच्छा से मारा गया; विनश्यति—नष्ट हो जाता है; जीवति—जीवित रहता है; अनाथ: अपि—बिना रक्षक के भी; तत्-ईक्षित:—भगवान् द्वारा रक्षित होकर; वने—जगंल में; गृहे—घर में; अभिगुप्त:— पूरी तरह गुप्त तथा रक्षित; अस्य—इसका; हत:—मारा गया; न—नहीं; जीवति—बचता है ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी मनुष्य अपना धन सडक़ पर खो देता है जहाँ सभी उसे देख सकते हैं; फिर भी यह धन भाग्यवश सुरक्षित पड़ा रहता है और इसे कोई नहीं देख पाता। इस तरह जिस व्यक्ति ने इस धन को खोया था, उसे यह वापस मिल जाता है। दूसरी ओर, यदि भगवान् सुरक्षा प्रदान नहीं करते तो घर में अत्यन्त सुरक्षित ढंग से रखा होने पर भी यह धन खो जाता है। यदि भगवान् किसी की रक्षा करते हैं, तो उसका कोई रक्षक न होते हुए भी तथा जंगल में रहते हुए भी वह जीवित रहता है जब कि घर पर सम्बन्धियों तथा अन्यों से रक्षित होते हुए भी मनुष्य कभी-कभी मर जाता है; कोई उसकी रक्षा नहीं कर पाता।
 
तात्पर्य
 ये भगवान् की श्रेष्ठता के उदाहरण हैं। रक्षा करने या संहार करने की हमारी योजनाएँ सफल नहीं होतीं, किन्तु भगवान् जो भी करने की सोच लेते हैं वह सचमुच होकर रहता है। इस प्रसंग में दिये गये उदाहरण व्यावहारिक हैं। हर एक को ऐसे अनुभव हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त भी अनेक स्पष्ट उदाहरण हैं। उदाहरणार्थ, प्रह्लाद महाराज ने कहा कि
सचमुच ही बालक अपने माता-पिता पर आश्रित रहता है, किन्तु उनके होते हुए भी बालक को अनेक यातनाएँ सहनी होती हैं। कभी-कभी अच्छी से अच्छी दवा एवं अनुभवी वैद्य के होते हुए भी रोगी बच नहीं पाता। चूँकि सब कुछ भगवान् की मुक्त इच्छा (मर्जी) पर निर्भर है, अतएव हमारा एकमात्र कर्तव्य है कि हम उनकी शरण में जाएं और उनका आश्रय खोजें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥