श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 41

 
श्लोक
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-
र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वश: ।
न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित-
स्तस्या गुणैरन्यतमो हि बध्यते ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
भूतानि—जीवों के समस्त शरीर; तै: तै:—अपने अपने; निज-योनि—अपने शरीर उत्पन्न करके; कर्मभि:—पूर्व कर्मों के द्वारा; भवन्ति—प्रकट होते हैं; काले—काल क्रम से; न भवन्ति—अदृश्य होते हैं; सर्वश:—सभी तरह से; न—नहीं; तत्र—वहाँ; ह— निस्सन्देह; आत्मा—आत्मा; प्रकृतौ—इस भौतिक जगत के भीतर; अपि—यद्यपि; स्थित:—स्थित; तस्या:—उस (भौतिक शक्ति) के; गुणै:—विभिन्न गुणों के द्वारा; अन्य-तम:—अत्यन्त भिन्न; हि—निस्सन्देह; बध्यते—बाँधा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक बद्धजीव अपने कर्म के अनुसार भिन्न प्रकार का शरीर पाता है और जब उसका कार्य समाप्त हो जाता है, तो शरीर भी नष्ट हो जाता है। यद्यपि आत्मा विभिन्न योनियों में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरों में स्थित रहता है, किन्तु वह उनसे बँधा नहीं रहता, क्योंकि वह व्यक्त शरीर से सदा-सदा पूर्णतया भिन्न माना जाता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ स्पष्ट बताया गया है कि जीव द्वारा विभिन्न शरीर धारण किये जाने के लिये ईश्वर जिम्मेदार नहीं है। जीव को प्रकृति के नियमों तथा अपने-अपने कर्म के अनुसार शरीर धारण करना होता है। अतएव वैदिक आदेश है कि भौतिक कार्यों में संलग्न व्यक्तियों को ऐसे निर्देश दिये जाँय जिससे वह अपने कार्यों को भगवान् की सेवा में लगा सके और बारम्बार जन्म-मरण के भव-बन्धन से छूट सके (स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:)। भगवान् तो सदा ही निर्देश देने के लिए तत्पर रहते हैं। निसन्देह, उनके निर्देश भगवद्गीता में विस्तार से दिये हुए हैं। यदि हम इन निर्देशों का लाभ उठाएँ तो प्रकृति के नियमों से बद्ध रह कर भी हम अपनी मूल स्थिति प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र हो सकेंगे (मामेव ये
प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते )। हमें दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि भगवान् सर्वश्रेष्ठ हैं और यदि हम उनकी शरण ग्रहण करें तो वे हमारी जिम्मेदारी ले कर हमें बता सकेंगे कि किस तरह भौतिक जीवन से छूट कर हम भगवद्धाम को वापस जा सकते हैं। ऐसी शरणागति के बिना मनुष्य को अपने कर्म के अनुसार शरीर-विशेष धारण करना पड़ता है—कभी पशु का तो कभी देवता का आदि आदि। यद्यपि शरीर यथासमय मिलता और विनष्ट होता है, किन्तु आत्मा वास्तव में शरीर में मिलता नहीं, अपितु उस गुण-विशेष के वशीभूत होता है, जिससे वह पापपूर्ण ढंग से जुड़ा रहता है। आध्यात्मिक शिक्षा से मनुष्य की चेतना बदल जाती है, जिससे वह भगवान् की आज्ञाओं का पालन करता है और प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥