श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 43

 
श्लोक
यथानलो दारुषु भिन्न ईयते
यथानिलो देहगत: पृथक् स्थित: ।
यथा नभ: सर्वगतं न सज्जते
तथा पुमान् सर्वगुणाश्रय: पर: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; अनल:—आग; दारुषु—काष्ठ में; भिन्न:—पृथक्; ईयते—देखी जाती है; यथा—जिस प्रकार; अनिल:— वायु; देह-गत:—शरीर के भीतर; पृथक्—विलग; स्थित:—स्थित; यथा—जिस तरह; नभ:—आकाश; सर्व-गतम्— सर्वव्यापक; न—नहीं; सज्जते—मिलता है, लिप्त होता है; तथा—उसी प्रकार; पुमान्—जीव; सर्व-गुण-आश्रय:—यद्यपि प्रकृति के सभी गुणों का आश्रय; पर:—भौतिक कल्मष से परे ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह अग्नि काष्ठ में स्थित रहती है, किन्तु वह काष्ठ से भिन्न समझी जाती है, जिस तरह वायु मुँह तथा नथुनों के भीतर स्थित रहती है, किन्तु उनसे पृथक् मानी जाती है और जिस तरह आकाश सर्वत्र व्याप्त होकर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता उसी तरह जीव भी, जो भले ही इस समय भौतिक शरीर में बन्दी है, उस शरीर का स्रोत होते हुए भी उससे पृथक् है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् ने बताया है कि भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही शक्तियाँ उन्हीं से उद्भूत होती हैं। भौतिक शक्ति को मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा—भगवान् की आठ पृथक् शक्तियाँ कहा गया है। यद्यपि आठ स्थूल तथा सूक्ष्म भौतिक शक्तियाँ हैं—जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार हैं, भिन्ना अर्थात् भगवान् से पृथक् कही गई हैं, किन्तु वास्तव में वे ऐसी हैं नहीं। जिस प्रकार अग्नि काष्ठ से पृथक् प्रतीत होती है और जिस तरह नथनों तथा मुँह में से होकर निकलने वाली वायु शरीर से भिन्न लगती है उसी तरह परमात्मा जीव से भिन्न लगता है, किन्तु एक ही साथ वह भिन्न
तथा अभिन्न होता है। यही श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रतिपादित अचिन्त्य भेदाभेद-तत्त्व का दर्शन है। कर्मफलों के अनुसार प्राणी भगवान् से पृथक् प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह भगवान् से घनिष्ठतापूर्वक सम्बद्ध होता है। फलस्वरूप भले ही इस समय हम भगवान् द्वारा उपेक्षित लगें, लेकिन वास्तव में वे हमारे कार्यकलापों के प्रति सदैव सजग रहते हैं। अतएव प्रत्येक परिस्थिति में हमें भगवान् की श्रेष्ठता पर ही आश्रित रहना चाहिए और उनके साथ अपने घनिष्ठ सम्बन्ध को पुनरुज्जीवित करना चाहिए। हमें भगवान् की सत्ता तथा नियंत्रण पर आश्रित रहना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥