श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 44

 
श्लोक
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।
य: श्रोता योऽनुवक्तेह स न द‍ृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
सुयज्ञ:—सुयज्ञ नामक राजा; ननु—निस्सन्देह; अयम्—यह; शेते—लेटा है; मूढा:—हे मूर्ख जनो; यम्—जिसको; अनुशोचथ—रोदन करते हो; य:—जो; श्रोता—सुनने वाला; य:—जो; अनुवक्ता—बोलने वाला; इह—इस संसार में; स:— वह; न—नहीं; दृश्येत—दृष्टिगोचर है; कर्हिचित्—किसी भी समय ।.
 
अनुवाद
 
 यमराज ने आगे कहा : हे शोक करने वालो, तुम सारे के सारे मूर्ख हो। तुम जिस सुयज्ञ नाम व्यक्ति के लिए शोक कर रहे हो वह तुम्हारे समक्ष अब भी लेटा है। वह कहीं नहीं गया। तो फिर तुम्हारे शोक का क्या कारण है? पहले वह तुम्हारी बातें सुनता था और उत्तर देता था, किन्तु तुम लोग अब उसे न पाकर शोक कर रहे हो। यह विरोधमूलक आचरण है, क्योंकि तुमने वास्तव में उस व्यक्ति को शरीर के भीतर कभी नहीं देखा था, जो तुम्हें सुनता था और उत्तर देता था। तुम्हें शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम जिस शरीर को हमेशा देखते आये हो वह तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।
 
तात्पर्य
 बालक के रूप में यमराज द्वारा दिया गया यह उपदेश सामान्य व्यक्ति की भी समझ में आने वाला है। जो सामान्य व्यक्ति शरीर को आत्मा मान लेता है, वह निश्चय ही पशु सदृश है (यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुके...स एव गोखर:) लेकिन एक सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य चला जाता है। यद्यपि शरीर वही पड़ा रहता है, किन्तु मृत व्यक्ति के सम्बन्धी शोक करते हैं कि वह चला गया है क्योंकि सामान्य व्यक्ति शरीर को तो देखता है, किन्तु आत्मा को नहीं देखता। जैसाकि भगवद्गीता में वर्णन हुआ—देहिनोऽस्मिन् यथा
देहे—शरीर का मालिक आत्मा भीतर रहता है। मृत्यु के बाद जब श्वास नथुनों के भीतर जानी बन्द हो जाती है, तो लोग समझ सकते हैं कि शरीर के भीतर जो व्यक्ति अभी तक सुन कर उत्तर दे रहा था अब चला गया है। अतएव वास्तव में सामान्य व्यक्ति यह निष्कर्ष निकालता है कि आत्मा शरीर से सचमुच भिन्न था और अब चला गया है। इस प्रकार एक सामान्य व्यक्ति भी अपने होश में रह कर यह जान सकता है कि जो वास्तविक व्यक्ति शरीर के भीतर था और सुन कर उत्तर दे रहा था वह कभी दिखा नहीं। अतएव जो कभी दिखा न हो, उसके लिए शोक करने की क्या आवश्यकता है?
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥